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शाट्यायनीय • अध्याय 1 • श्लोक 35
त्रिंशत्परांस्त्रिंशदपरांस्त्रिशच्च परतः परान्। उत्तारयति धर्मिष्ठः परिव्राडिति वै श्रुतिः ॥
विद्वान् धर्मिष्ठ संन्यासी तीस पर (बाद की), तीस अपर (पूर्व की) एवं तीस पर से भी पर (बाद से बाद की) पीढ़ियों-पूर्वजों को तार देता है, ऐसा श्रुति का वचन है।
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