अथ खलु सोम्येदं परिव्राज्यं नैष्ठिकमात्मधर्म यो विजहाति स वीरहा भवति। स ब्रह्महा भवति। स भ्रूणहा भवति। स महापातकी भवति। य हमां वैष्णवीं निष्ठां परित्यजति । स स्तेनो भवति। गुरुतल्पगो भवति। समित्रधुग्भवति । स कृतघ्नो भवति। स सर्वस्मा लोकात्प्रच्युतो भवति। तदेतदृचाभ्युक्तम्। स्तेनः सुरापो गुरुतल्पगामी मित्रधुगेते निष्कृतेर्वान्ति शुद्धिम। व्यक्तमव्यक्तं वा विधृतं विष्णुलिङ्गं त्यजन्न शुध्येदखिलैरात्मभासा ॥
हे प्रिय सोम्य! जो अपने इस नैष्ठिक संन्यासियों के धर्म को छोड़ देता है, वह पुरुषत्वनाशक, ब्रह्मघाती, गर्भघाती तथा महापातकी (के सदृश) होता है। जो (संन्यासी) इस वैष्णवी निष्ठा को त्याग देता है, वह चोर होता है। गुरुपत्नीगामी, मित्रद्रोही एवं कृतघ्न हो जाता है तथा समस्त लोकों से भ्रष्ट होकर अधोगति को प्राप्त होता है। इस सन्दर्भ में ये ऋचाएँ हैं - चोर, शराबी, गुरुपत्नीगामी, एवं मित्रद्रोही ये प्रायश्चित्त से शुद्ध हो जाते हैं; किन्तु व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूप विष्णु लिङ्ग (अनुशासन सूत्रों) को छोड़ने पर संन्यासी किसी भी तरह से पवित्र नहीं हो सकता है।
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