योगयज्ञः सदैकाग्र्यभक्त्या सेवा हरेर्गुरोः।
अहिंसा तु तपोयज्ञो वाड्मनः कायकर्मभिः ॥
एकाग्रचित्त होकर भक्ति भाव से योग, यज्ञ भगवान् (विष्णु) तथा गुरु की सेवा और मन, वाणी एवं कर्म के द्वारा हिंसारहित तप रूपी यज्ञ सतत करते रहना चाहिए।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शाट्यायनीय के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
शाट्यायनीय के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।