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शाट्यायनीय • अध्याय 1 • श्लोक 34
तदेतदृचाभ्युक्तम्। शतं कुलानां प्रथमं बभूव तथा पराणां त्रिशतं समग्रम् । एते भवन्ति सुकृतस्य लोके येषां कुले संन्यसतीह विद्वान् ॥
जो विद्वान् इस संन्यास-धर्म को ग्रहण करता है, उसके कुल में सौ पीढ़ी पूर्व तथा तीन सौ पीढ़ी बाद तक जन्म लेने वालों का उद्धार हो जाता है। ऐसे श्रेष्ठ कृत्य करने वाले विद्वान् संन्यासी कभी-कभी ही इस लोक में प्रकट होकर इसे कृतार्थ करते हैं।
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