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शाट्यायनीय • अध्याय 1 • श्लोक 10
विष्णुलिङ्गं द्विधा प्रोक्तं व्यक्तमव्यक्तमेव च। तयोरेकमपि त्यक्त्वा पतत्येव न संशयः ॥
विष्णुलिङ्ग व्यक्त और अव्यक्त ऐसे दो प्रकार के चिह्न विष्णु (संन्यासी) के कहे गये हैं। इन दोनों में से किसी एक का भी परित्याग कर देने पर संन्यासी पथभ्रष्ट हो जाता है। इसमें कुछ भी संशय नहीं।
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