मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शाट्यायनीय • अध्याय 1 • श्लोक 12
अथ खलु सौम्य कुटीचको बहूदको हंसः परमहंस इत्येते परिव्राजकाश्चतुर्विधा भवन्ति । सर्व एते विष्णुलिङ्गिनः शिखिन उपवीतिनः शुद्धचित्ता आत्मानमात्मना ब्रह्म भावयन्तः शुद्धचिद्रूपोपासनरता जपयमवन्तो नियमवन्तः सुशीलिनः पुण्यश्नोका भवन्ति । तदेतदृचाभ्यु-क्तम्। कुटीचको बहूदकश्चापि हंसः परमहंस इव वृत्त्या च भिन्नाः । सर्व एते विष्णुलिङ्ग दधाना वृत्त्या व्यक्तं बहिरन्तश्च नित्यम् ॥
हे सौम्य! संन्यासी के कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहस - ये चार भेद होते हैं। ये चारों यज्ञोपवीत शिखा तथा विष्णु लिंग (संन्यासी के प्रतीक सर्वव्यापकता समदर्शिता) को धारण करने वाले शुद्ध चित्त, स्वयं अपनी आत्मा में ब्रह्म को प्रतिष्ठित करने की भावना करते हुए उपासना करने वाले, जप और यम-नियम का पालन करने वाले एवं सुन्दर स्वभाव वाले होते हैं। इस सम्बन्ध में यह ऋचा है - 'कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस ये चार प्रकार अपनी-अपनी पृथक् वृत्तियों से भिन्न-भिन्न बताये गये हैं। ये सभी व्यक्त एवं अव्यक्त, बाह्य एवं अन्तः रूप विष्णु लिंग (संन्यास के चिह्न) को धारण करने वाले होते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शाट्यायनीय के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शाट्यायनीय के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें