बाल्येनैव हि तिष्ठासेन्निर्विद्य ब्रह्मवेदनम्।
ब्रह्मविद्यां च बाल्यं च निर्विद्य मुनिरात्मवान् ॥
वैराग्ययुक्त होकर ही स्थिर रहने की इच्छा करनी चाहिए। ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, ऐसा दृढ़ निश्चय कर ब्रह्म को पहचान एवं वैराग्य को भली-भाँति समझकर आत्माराम होकर सर्वत्र आत्मदर्शन करे।
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