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शाट्यायनीय • अध्याय 1 • श्लोक 15
दशभिः प्रणवैः सप्तव्याहृतिभिश्चतुष्पदा । गायत्रीजप यज्ञश्च त्रिसंध्यं शिरसा सह ॥
दश प्रणव (ॐकार) तथा सात व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) के सहित चार पाद युक्त एवं सिर (आपोज्योती इत्यादि) युक्त गायत्री का जप एवं यज्ञ त्रिकाल सन्ध्या के साथ करना चाहिए।
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