अथ खलु सोम्यैते परिव्राजका यथा प्रादुर्भवन्ति तथा भवन्ति। कामक्रोधलोभमोहदम्भदर्पासूयाममत्वाहंकारादीस्तितीर्य मानावमानौ निन्दास्तुती च वर्जयित्वा वृक्ष इव तिष्ठा-सेत् । छिद्यमानो न ब्रूयात् । तदेवं विद्वांस इहैवामृता भवन्ति । तदेतदृचाभ्युक्तम्। बन्धुपुत्रमनुमो-दयित्वानवेक्ष्यमाणो द्वन्द्वसहः प्रशान्तः। प्राचीमुदीचीं वा निर्वर्तयंश्चरेत ॥
हे प्रिय सोम्य! ये परिव्राजक जिस प्रकार प्रादुर्भूत होते हैं, वह बतला दिया गया है। ये संन्यासी काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ, दर्प (घमण्ड), असूया (दूसरे के गुणों में दोष निकालना), ममता, अहंकार आदि को पार करके, मान-अपमान, निन्दा-प्रशंसा को देखकर वृक्षवत् अविचल रहते हैं, काटे जाने (कष्ट पड़ने) पर भी कुछ बोलते नहीं। इस प्रकार से विद्वज्जन इस लोक में ही अमृत-जीवन्मुक्त हो जाते हैं। इस सन्दर्भ में यह ऋचा द्रष्टव्य है - ' भाई, पुत्रादि का पालन-पोषण करने के पश्चात् फिर कभी उनकी ओर नहीं देखे। दुःखादि सहते हुए पूर्व एवं उत्तर दिशाओं में अपने-अपने स्वरूप का अनुसंधान करते हुए भ्रमण करे।'
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