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शाट्यायनीय • अध्याय 1 • श्लोक 42
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ इति शाट्यायनीयोपनिषत्समाप्ता ॥
वह (ब्रह्म) पूर्ण है, यह (जगत्) भी पूर्ण है। (उस) पूर्ण ब्रह्म से ही यह पूर्ण विश्व प्रादुर्भूत हुआ है। उस पूर्ण ब्रह्म में से इस पूर्ण जगत् को निकाल लेने पर पूर्ण ब्रह्म ही शेष रहता है। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
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