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अध्याय 28 — अथ सद्योवर्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
24 श्लोक • केवल अनुवाद
कृष्ण पक्ष में वर्षा-खम्बन्धी प्रश्न करने पर यदि जलचर राशि में स्थित होकर चन्द्रमा लग्न में बैठा हो या शुक्ल पक्ष में जलचर राशि में स्थित होकर केन्द्र (चतुर्य, सप्तम या दसम ) में बैठा हो और इन दोनों योगों में यदि चन्द्रमा शुभग्रह से दृष्ट हो हो बहुत जल्दी अधिक वृष्टि और पापग्रह से दृष्ट हो तो घोड़ी वृष्टि होती है।
यदि वर्षासम्बन्धी प्रश्न में प्रश्नकर्ता गीली वस्तु, जल, जलसंज्ञक वस्तु (क्षीर, अभ्य इत्यादि) का स्पर्श करे, जल के समीप में स्थित हो, जलसम्बन्धी किसी कार्य में लगा हो या किसी अन्य के द्वारा जल शब्द सुनने में आये तो निःसन्देह शीघ्र ही वृष्टि होती
वर्षासमय में उदयाचल पर्वत पर स्थित, अत्यन्त तीक्ष्ण किरण होने के कारण बड़ी कठिनता से देखने के लायक, गलित सुवर्ण के समान और निर्मल वैदूर्य मणि की तरह कान्ति बाला सूर्य जिस दिन दिखाई दे, उसी दिन वृष्टि करता है तथा जिस दिन मध्याह काल में अति तोक्ष्ण किरण वाला सूर्य हो, उस दिन भी वर्षा करता है।
स्वादरहित जल, गौ के नेत्र के समान या काक के अण्डे के समान आकाश, निर्मल दिशा, नमक में विकार (पानी आदि आ जाना), वायु का निरोध, अतिशय उछल- उछल कर जल से सूखे में मछलियों का आना, मेढकों का बार-बार शब्द करना-ये सब वृष्टि के कारण हैं।
यदि पिल्ली बार-बार अपने नाखून से भूमि को खोदे, लोहों में विस्र (कच्चे मांस) को गन्ध से युत मत हो जाय या मार्ग में बालकों से रचित पुल दिखाई दे तो शीघ्र पुष्टि होगी- ऐसा कहना चाहिये ।
यदि अञ्जनचूर्ण के समान पर्वत, वाष्म से भरी हुई गुफा, जल में रहने वाले मुर्गे के नेत्र के समान (अति लोहित) चन्द्रकिरण हो तो शोघ्र वृष्टि होती है।
यदि विना कारण चोटियाँ अपने अण्डों को एक जगह से दूसरी जगह ले जायें, सर्पों का मैथुन हो, सर्प वृक्ष पर चढ़े या गी विना कारण उछले हो तो शोघ्र वृष्टि होगी।
यदि वृक्ष के शिखर पर स्थित होकर कुकलास (गिरगिट आकाश की तरफ देखता हो और गायें ऊपर को दृष्टि करके सूर्य को देखती हों तो शीघ्र वृष्टि होती है।
यदि पशु घर से बाहर होने की इच्छा न करें और कान तया पाँव हिलायें तो वृष्टि कहनी चाहिये अथवा पशु की तरह कुत्ता चेष्टा करे तो भी वृष्टि कहनी चाहिये।
जब पर के आच्छादन (छतों पर) पर स्थित होकर आकाश की तरफ देखता हुआ कुता भूके तथा ईशान कोण में बिजली दिखाई दे तब जल से पृथ्यो समान हो जाती है अर्थात् अधिक वृष्टि होती है ।
जिस समय तोता या कबूतर के नेत्र के समान या शहद की तरह चन्द्र हो या आकाश में दूसरा चन्द्र दिखाई दे तो शीघ्र वृष्टि होती है।
यदि रात में मेष फा गर्जन हो, दिन में सथिर के समान दण्डाकार विजली दिखाई दे तथा पूर्व दिशा को उण्दी हया चले तो मर्षा का आगम होता है।
यदि लताओं के नये पत्ते ऊर्ध्वमुख के हों, जल या धूलि से पक्षी स्नान करें या सरीसृप (कृमिजाति = सांप आदि) तृण के प्रान्त भाग पर स्थित हों तो शीघ्र वर्षा होती है।
मपूर, तोता, चाप (नीलकण्ठ), घातक, जपापुष्प या कमल के समान कान्ति वाले तया जल के आवर्त (भँवर), पर्वत, नक (नाक), कतुआ, सूअर या मछली के समान आकृति याले मेष हों तो शीघ्र मृष्टि करते हैं।
यदि चारो तरफ चूना या चन्द्र के समान चेत, मध्य में कज्जल या भ्रमर के समान कान्ति वाले, निर्मल, ऊपर ऊपर स्थित, जलबिन्दु छोड़ते हुये और सीढ़ी की तरह स्थित मेष पूर्व दिशा में उत्पन्न होकर पश्चिम की तरफ या पश्चिम में उत्पन्न होकर पूर्व दिशा को तरफ गमन करे तो पृथ्वी पर शीघ्र अधिक वृष्टि करता है।
यदि सूर्य के उदय या अस्त समय में इन्द्रधनु, परिघ (४७ वें अध्याय के १९ वें स्लोक में पठित), दूसरा सूर्य, रोहित ( ४७ अ. २० श्लोक) या सूर्य-चन्द्र का परिवेष दिखाई दे तो शीघ्र अधिक वृष्टि होती है।
यदि उदय या अस्तसमय तित्तिर के पंख के समान आकाश हो और आनन्दित होकर पक्षी गण शब्द करें तो क्रम से दिन और रात्रि में शीघ्र अति वृष्टि होती है। जैसे उदयकाल में उक्त लक्षण हो तो दिन में और अस्तकाल में हो तो रात्रि में अति वृष्टि होती है।
यदि हजार, अमोघ ( ३० अध्याय ११ वें श्लोक में पठित), अस्ताचल पर्वत के हाथ की तरह उन्नत सूर्य के किरण दिखाई दें और मेघ पृथ्वी के निकट आकर गर्ने तो वर्षा होने का उत्तम योग होता है।
यदि वर्षाकाल में शुक से सप्तम राशि में स्थित होकर चन्द्रमा शुभग्रह से देखा जाता हो अथवा शनैश्वर से नवम या पञ्चम में स्थित होकर शुभग्रह से देखा जाता हो तो जल के आगमन के लिये होता है।
ग्रहों के उदय या अस्तकाल में, चन्द्र के साथ समागम होने पर, मण्डल (शुक्रचारोक्त छ: मण्डल) में प्रवेश होने पर, पक्ष के अन्त में, सूर्य के दक्षिणायनान्त और उत्तरायणान्त ( कर्क और मकर संक्रान्ति) में तया सूर्य के आद्रां नक्षत्र में स्थित होने पर निक्ष्य करके सृष्टि होती है।
बुध-शुक्र, बुध-गुरु, गुरु-शुक्र और शनि-मंगल को युति हो तथा उस पर शुभग्रह को दृष्टि या योग न हो तो वायु और अग्नि का भय होता है।
यदि सूर्य से मन्दगति ग्रह आगे और शीघ्रगति ग्रह पीछे हों तो पृथ्वी को जल से समुद्र की तरह कर देते हैं।
यदि रात्रि में जुगनू मेप के समीप तक जाय तो शीघ्र मेघ धान्य के क्षेत्रों को पूर्ण करने बाली वृष्टि करता है।
यदि प्रदोष समय में वर्षा हो या सियार भूके तो निक्षय करके सात दिन तक दुर्दिन और वृष्टि होती है।
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