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बृहत्संहिता • अध्याय 28 • श्लोक 3
उदयशिखरिसंस्थो दुर्निरीक्ष्योऽ तिदीप्त्या द्रुतकनकनिकाशः स्निग्धवैदूर्यकान्तिः । तदहनि कुरुतेऽम्भस्तोयकाले विवस्वान् प्रतपति यदि चोच्चैः खं गतोऽतीव तीक्ष्णम् ॥
वर्षासमय में उदयाचल पर्वत पर स्थित, अत्यन्त तीक्ष्ण किरण होने के कारण बड़ी कठिनता से देखने के लायक, गलित सुवर्ण के समान और निर्मल वैदूर्य मणि की तरह कान्ति बाला सूर्य जिस दिन दिखाई दे, उसी दिन वृष्टि करता है तथा जिस दिन मध्याह काल में अति तोक्ष्ण किरण वाला सूर्य हो, उस दिन भी वर्षा करता है।
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