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बृहत्संहिता • अध्याय 28 • श्लोक 4
विरसमुदकं गोनेत्राभं विद्विमला दिशो लवणविकृतिः काकाण्डाभं यदा च भवेन्नभः । पवनविगमः पोप्लूयन्ते झषाः स्थलगामिनो रसनमसकृन्मण्डूकानां जलागमहेतवः ॥
स्वादरहित जल, गौ के नेत्र के समान या काक के अण्डे के समान आकाश, निर्मल दिशा, नमक में विकार (पानी आदि आ जाना), वायु का निरोध, अतिशय उछल- उछल कर जल से सूखे में मछलियों का आना, मेढकों का बार-बार शब्द करना-ये सब वृष्टि के कारण हैं।
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