वल्लीनां
गगनतलोन्मुखाः
स्नायन्ते यदि जलपांशुभिर्विहङ्गाः ।
सेवन्ते यदि च सरीसृपास्तृणाया-
ण्यासन्नो भवति तदा जलस्य पातः ॥
यदि लताओं के नये पत्ते ऊर्ध्वमुख के हों, जल या धूलि से पक्षी स्नान करें या सरीसृप (कृमिजाति = सांप आदि) तृण के प्रान्त भाग पर स्थित हों तो शीघ्र वर्षा होती है।
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