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बृहत्संहिता • अध्याय 28 • श्लोक 15
पर्यन्तेषु सुधाशशाङ्कधवला मध्येऽञ्जनालित्विषः स्निग्धा नैकपुटाः क्षरज्जलकणाः सोपानविच्छेदिनः । माहेन्द्रीप्रभवाः प्रयान्त्यपरतः प्राग् वाम्बुपाशोद्भवा ये ते [पुरिमुचस्त्यजन्ति न चिरादम्भः प्रभूतं भुवि ॥
यदि चारो तरफ चूना या चन्द्र के समान चेत, मध्य में कज्जल या भ्रमर के समान कान्ति वाले, निर्मल, ऊपर ऊपर स्थित, जलबिन्दु छोड़ते हुये और सीढ़ी की तरह स्थित मेष पूर्व दिशा में उत्पन्न होकर पश्चिम की तरफ या पश्चिम में उत्पन्न होकर पूर्व दिशा को तरफ गमन करे तो पृथ्वी पर शीघ्र अधिक वृष्टि करता है।
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