अध्याय 3 — तृतीय अंक
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
23 श्लोक • केवल अनुवाद
प्रियवदा:--
(हाथ की ओट में) अनसूया, उस राजर्षि के प्रथम दर्शन (के समय) से ही शकुन्तला उत्कण्ठित-सी रहती है । क्या इस (शकुन्तला) का यह रोग (सन्ताप) उस (राजर्षि) के ही कारण है ?
अनसूया:--
सखी, मेरे मन की भी ऐसी ही अशंका है । अच्छा तो इस (शकुन्तला) से ही पूछती हूँ । (प्रकट रूप में) सखी, तुमसे कुछ पूछना है । (क्योकि) तुम्हारा सन्ताप बहुत प्रबल है ।
शकुन्तला:--
(ऊपर के आधे भाग के साथ बिस्तर से उठकर) सखी, क्या कहना चाहती हो ?
अनसूया:--
सखी शकुन्तला, हम दोनों काम-सम्बन्धी (प्रेम-व्यापार सम्बन्धी) वृतांतो (बातों) से अनभिज्ञ हैं । किन्तु इतिहास की कथाओं में काम-पीड़ितों की जैसी अवस्था सुनी जाती है, मैं वैसी (ही) (अवस्था) तुम्हारी देख रही हूँ । बताओ, किस कारण से तुम्हारा सन्ताप है ? क्योकि रोग (विकार) को ठीक से जाने बिना उसकी चिकित्सा आरम्भ नहीं की जाती ।
राजा:--
अनसूया का भी मेरे जेसा विचार (जिज्ञासा) । (अर्थात् जो विचार मेरे मन में है वैसा ही अनसूया का भी है) । मेरा विचार (दर्शन) अपने अभिप्राय से नहीं था ।
शकुन्तला:--
(अपने मन में) (राजा के प्रति) मेरी आसक्ति अति प्रबल है (किन्तु) अब भी (फिर भी) इन दोनों (अनसूया और प्रियंवदा) से बताने में असमर्थ हूँ ।
प्रियंवदा:--
सखी शकुन्तला, यह (अनसूया) ठीक कहती है । अपने रोग की उपेक्षा क्यों कर रही हो ? प्रतिदिन तुम अंगों से क्षीण (दुर्बल) होती जा रही हो (अर्थात् तुम्हारे अंग दिनानुदिन क्षीण हो रहे हैं) । केवल सौन्दर्य से युक्त कान्ति (छाया) तुमको नहीं छोड रही है ।
राजा:--
प्रियंवदा ने सत्य (ठीक) कहा । क्योकि (इस शकुन्तला का) मुखमण्डल अत्यन्त क्षीण कपोलों वाला हो गया है (अर्थात् दोनों कपोल धंस गये हैं), वक्षःस्थल कठोरता से रहित (ढीले) स्तनों वाला हो गया है (अर्थात् वक्षःस्थल के दोनों स्तन ढीले पड़ गये हैं), कटिभाग अत्यन्त क्षीण (पतला) हो गया है, दोनों कन्धे अत्यधिक झुक गए हैं (तथा) (शरीर की) कान्ति पीली पड़ गयी है । (सम्प्रति) कामपीड़ित यह (शकुन्तला) पत्तों को सुखा देने वाली वायु के द्वारा छुयी गयी (झुलसी हई) वासन्तीलता की भाँति शोचनीय तथा देखने में प्रिय (सुन्दर) लग रही है । (अर्थात् शारीरिक दृष्टि से शोचनीय होते हुए भी देखने में सुन्दर प्रतीत हो रही है) ।
(इसका मुंह उठाना चाहता है । शकुन्तला अभिनयपूर्वक रोकती है)
(नेपथ्य में) हे चकवी (चक्रवाक-वधू), अपने साथी (चकवे) को विदा करो । रात आ गयी (हो गयी) है ।
शकुन्तला:--
(घबराहट के साथ) हे पुरुवंशी राजन् , निःसन्देह मेरे शरीर का समाचार जानने के लिये आर्य गौतमी इधर ही आ रही हैं । इसलिये शाखाओं (डालियो) की ओट (आड़) मे छिप जाइये ।
राजा:--
(जैसा आप कहती हैं) । वैसा (ही करता हूँ) । (अपने को छिपाकर खड़ा हो जाता है) ।
(तत्पश्चात् पात्र लिये हुये गोतमी और दोनों सखियाँ प्रवेशा करती हैं)
दोनों सखियां:--
आर्या गोतमी, इधर से, इधर से (आइये) ।
गौतमी:--
(शकुन्तला के समीप जाकर) पुत्री, तुम्हारे अंगों का सन्ताप कुछ कम हुआ ?
शकुन्तला:--
आर्या मुझे कुछ अन्तर (लाभ) है ।
गौतमी:--
इस कुश-युक्त जल से तुम्हारा शरीर पूर्ण स्वस्थ (सन्तापरहित) हो जायेगा । (शकुन्तला के सिर पर जल छिड़ककर) बेटी, दिन ढल गया है । आओ, कुटी पर ही चलें । (सभी चल देती हैं) ।
शकुन्तला:--
(अपने मन में) हे हदय, पहले तो (दुष्यन्त रूप) मनोरथ के अनायास प्राप्त होने पर (तुमने अपना) संकोच (कातरभावः) नहीं छोड़ा । अब पश्चात्ताप के साथ वियुक्त होते हुये (बिछड़ते हुये) (तुमको) क्यों सन्ताप (हो रहा है) ? कुछ पग चलने के बाद रुक कर (प्रकट रूप में) हे सन्ताप को दूर करने वाले लताकुञ्च, तुमको फिर सेवन (उपभोग) के लिये निमन्त्रित कर रही हूँ । (शकुन्तला दुखपूर्वक दूसरों के साथ चली जाती है) ।
राजा:--
(पहले वाले स्थान पर जाकर, लम्बी सांस लेकर) अहो, अभीष्ट (अभिलषित) वस्तुओं की प्राप्ति विघ्नो (बाधाओं) से युक्त होती है । क्योंकि मेरे द्वारा सुन्दर नेत्रों वाली (शकुन्तला) का बार-बार उंगली (तर्जनी) से ठके हुए अधरोष्ठ वाला, (चुम्बनादि के) निषेध (मना करने) के अक्षरों के अस्पष्ट उच्चारण करने के कारण मनोहर और (उसके द्वारा) कन्धों की ओर मोड़ा गया मुख (मेरे द्वारा) किसी प्रकार (अर्थात् बड़ी कठिनाई से) ऊपर उठाया गया किन्तु चूमा नहीं जा सका (अर्थात् मैंने उसके मुख को ऊपर तो उठा लिया, किन्तु चुम्बन नहीं कर पाया ।