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अध्याय 3 — तृतीय अंक

अभिज्ञानशाकुन्तलम्
23 श्लोक • केवल अनुवाद
(तत्पश्चात्‌ कुशों को लेकर यजमान (कण्व) का शिष्य प्रवेश करता है) । शिष्य:-- ओह, राजा दुष्यन्त अत्यन्त प्रभावशाली हैं । उन महानुभाव के आश्रम में प्रवेश करते ही हमारे (धार्मिक यज्ञादि) कार्य निर्विघ्न होने लगे हैं । बाण चढ़ाने पर तो क्या कहना ( अर्थात्‌ बाण चढ़ाने की तो बात ही क्या है), क्योकि वह (राजा दुष्यन्त) दूर से प्रतयञ्चा के शब्द के द्वारा ही मानो धनुष की हङ्कार से विघ्नों (बाधाओं) को दूर कर देते हैं ।
तब तक (इस) वेदी पर बिछाने के लिये इन कुशों को ऋत्विज (पुरोहितं) को देता हूँ (घूमकर और आकाश की ओर देखकर) प्रियंवदा, उशीर (खस) का यह लेप और कमल-नाल सहित कमल के ये पतते किसके लिये ले जाये जा रहे है ? (सुनने का अभिनय कर) क्या कह रही हो ? आतप (लू) लगने से शकुन्तला अत्यधिक अस्वस्थ हो गयी है, उसके शरीर को शान्ति प्रदान करने (निर्वाप) के लिये (यह सामग्री ले जा रही हूँ) । तो यत्नपूर्वक (सावधानी से) उपचार करना । वह भगवान्‌ कुलपति कण्व की प्राण है । तब तक मैं भी उसके लिये यज्ञीय (वैतानिक) शान्ति-जल गोतमी के हाथ भिजवा रहा हूँ । (निकल जाता है) । || विष्कम्भक समाप्त ॥ राजा:-- (लम्बी सांस लेकर) मैं तपस्या के सामर्थ्य (शक्ति) को जानता हूँ । वह कन्या (शकुन्तला) पराधीन (है) यह (भी) मुझको ज्ञात है । तो भी (अपने) हदय (मन) को उससे लोटाने में (हटाने) में समर्थ नहीं हूँ ।
(कामपीड़ा का अभिनय करके) भगवन्‌ कामदेव अत्यन्त विश्वसनीय तुम्हारे और चन्द्रमा के द्वारा कामिजनों का समूह ठगा जाता है । क्योकि तुम्हारा पुष्प-बाण से युक्त होना और चन्द्रमा का शीतल किरण वाला होना, ये दोनों (बातें) मेरे जैसे (कामपीडितों ) के विषय मे असत्य (विपरीत) दिखायी देती हैं । (क्योकि) चन्द्रमा (अपनी) शीतल किरणों से अग्नि की वर्षा कर रहा है (अग्नि उगल रहा है) ओर तुम भी (अपने) पुष्प के बाणों को वज्र की भांति कठोर बना रहे हो ।
(खेद के साथ घुमकर) यज्ञ-कार्य के समाप्त (सम्पन्न) हो जाने पर (यज्ञ-सभा के) सदस्यों (ऋषियों) द्वारा आज्ञा प्राप्त कर मैं अपने खिन्न मन को कहाँ बहलाऊं । (लम्बी सांस लेकर) प्रिय (शकुन्तला) के दर्शन के अतिरिक्त मेरे लिये दूसरा क्या सहारा है । तब तक मैं उसी को ढूंढता हूं । (सूर्य को देखकर) इस तेज धूप वाली वेला (समय) को शकुन्तला प्रायः अपनी सखियों के साथ लता-कुञ्ञो वाले मालिनी नदी के तट पर बिताती होगी । तो वहां ही जाता (चलता) हूं । (चारों ओर घूमकर और स्पर्शं का अभिनय कर) ओह, यह स्थान सुखद वायु (प्रवात) के कारण अत्यन्त सुहावना है । कमलों की सुगन्ध से युक्त और मालिनी (नदी) की तरंग (लहर) के (जल के) कणों को वहन (धारण) करने वाली वायु काम-सन्तप्त अंगों से निरन्तर आलिंगन करने के योग्य है ।
(घूमकर और देखकर) बेंत से घिरे हए इस लतामण्डप में शकुन्तला को होना चाहिये । क्योकि पीले बालू (रेत) वाले इस (लतापमण्डप) के द्वार पर आगे की ओर उठी हुई (उभरी हुई) और नितम्बों के भार के कारण पीछे की ओर गहरी (धंसी हुई) नयी (अभी-अभी बनी हुई) पदचिन्हों की पंक्ति दिखायी दे रही है ।
तब तक शाखाओं के बीच से देखता हूँ । (घूमकर, वैसा ही करके (अर्थात्‌ शाखाओं के बीच से देखकर प्रसत्नतापूर्वक) अहो, मेरे नेत्रों को परमानन्द प्राप्त हो गया । यह मेरी अभिलषित (मनचाही) प्रियतमा फूलों के बिछौने से युक्त शिलापट्ट पर लेटी हुई है और दो सखियों द्वारा (उसको) सेवा की जा रही है । अच्छा, इनके विश्वस्त (गोपनीय) वार्तालाप को सुनता हूँ । (देखता हुआ खड़ा रहता है) । (तत्पश्चात्‌ पूर्वोक्त स्थिति में शकुन्तला दोनों सखियों के साथ प्रवेश करती है) दोनों सखियां:-- (पंखे से हवा झूल कर स्नेहपूर्वक) सखी शकुन्तला, क्या कमलिनीपत्र (से बने पंखे) की हवा तुम्हे सुख दे रही है ? शकुन्तला:-- सखियों, क्या (तुम दोनों) मुझे हवा (पंखा) झूल रही हो ? (दोनों सखियाँ चिन्ता का अभिनय कर एक दूसरे की ओर देखने लगती हैं) । राजा:-- शकुन्तला अत्यन्त अस्वस्थ शरीर वाली दिखायी दे रही है । (विचारपूर्वक) तो क्या यह लू (आतप) का प्रभाव (दोष) है अथवा जैसा मेरे मन में है । (इच्छापूर्वक देखकर) अथवा (इस विषय) में सन्देह करना व्यर्थ है । प्रिय (शकुन्तला) का, स्तनो पर लगे हुये खस के लेप वाला तथा ढीले कमलनाल के एक कङ्कन वाला पीडित (अस्वस्थ) यह शरीर क्या ही मनोहर (है) (सचमुच) युवतियों पर कामदेव और लू के सञ्चार का सन्ताप भले ही समान (हो), किन्तु लू का सन्ताप ऐसा सोन्दर्यवर्धक (मनोहर) नहीं (होता) ।
प्रियवदा:-- (हाथ की ओट में) अनसूया, उस राजर्षि के प्रथम दर्शन (के समय) से ही शकुन्तला उत्कण्ठित-सी रहती है । क्या इस (शकुन्तला) का यह रोग (सन्ताप) उस (राजर्षि) के ही कारण है ? अनसूया:-- सखी, मेरे मन की भी ऐसी ही अशंका है । अच्छा तो इस (शकुन्तला) से ही पूछती हूँ । (प्रकट रूप में) सखी, तुमसे कुछ पूछना है । (क्योकि) तुम्हारा सन्ताप बहुत प्रबल है । शकुन्तला:-- (ऊपर के आधे भाग के साथ बिस्तर से उठकर) सखी, क्या कहना चाहती हो ? अनसूया:-- सखी शकुन्तला, हम दोनों काम-सम्बन्धी (प्रेम-व्यापार सम्बन्धी) वृतांतो (बातों) से अनभिज्ञ हैं । किन्तु इतिहास की कथाओं में काम-पीड़ितों की जैसी अवस्था सुनी जाती है, मैं वैसी (ही) (अवस्था) तुम्हारी देख रही हूँ । बताओ, किस कारण से तुम्हारा सन्ताप है ? क्योकि रोग (विकार) को ठीक से जाने बिना उसकी चिकित्सा आरम्भ नहीं की जाती । राजा:-- अनसूया का भी मेरे जेसा विचार (जिज्ञासा) । (अर्थात्‌ जो विचार मेरे मन में है वैसा ही अनसूया का भी है) । मेरा विचार (दर्शन) अपने अभिप्राय से नहीं था । शकुन्तला:-- (अपने मन में) (राजा के प्रति) मेरी आसक्ति अति प्रबल है (किन्तु) अब भी (फिर भी) इन दोनों (अनसूया और प्रियंवदा) से बताने में असमर्थ हूँ । प्रियंवदा:-- सखी शकुन्तला, यह (अनसूया) ठीक कहती है । अपने रोग की उपेक्षा क्यों कर रही हो ? प्रतिदिन तुम अंगों से क्षीण (दुर्बल) होती जा रही हो (अर्थात्‌ तुम्हारे अंग दिनानुदिन क्षीण हो रहे हैं) । केवल सौन्दर्य से युक्त कान्ति (छाया) तुमको नहीं छोड रही है । राजा:-- प्रियंवदा ने सत्य (ठीक) कहा । क्योकि (इस शकुन्तला का) मुखमण्डल अत्यन्त क्षीण कपोलों वाला हो गया है (अर्थात्‌ दोनों कपोल धंस गये हैं), वक्षःस्थल कठोरता से रहित (ढीले) स्तनों वाला हो गया है (अर्थात्‌ वक्षःस्थल के दोनों स्तन ढीले पड़ गये हैं), कटिभाग अत्यन्त क्षीण (पतला) हो गया है, दोनों कन्धे अत्यधिक झुक गए हैं (तथा) (शरीर की) कान्ति पीली पड़ गयी है । (सम्प्रति) कामपीड़ित यह (शकुन्तला) पत्तों को सुखा देने वाली वायु के द्वारा छुयी गयी (झुलसी हई) वासन्तीलता की भाँति शोचनीय तथा देखने में प्रिय (सुन्दर) लग रही है । (अर्थात्‌ शारीरिक दृष्टि से शोचनीय होते हुए भी देखने में सुन्दर प्रतीत हो रही है) ।
शकुन्तला:-- सखी, भला ओर किससे (अपनी दशा) बताऊंगी ? किन्तु अब (बताकर) मैं तुम दोनों को कष्ट देने वाली (ही) होऊंगी । दोनों:-- इसीलिये तो आग्रह (किया जा रहा) है । क्योकि स्नेही लोगों से बांटे गये (बताये गये) दुख की पीड़ा सह्य हो जाती है । राजा:-- दुख और सुख मे समान रहने वाले (अर्थात्‌ दुख और सुख की साथी) व्यक्तियों (सखियों) के द्वारा पूछी गयी यह किशोरी (शकुन्तला) मानसिक (अपने मन के) दुख के कारण को नहीं बतायेगी (ऐसी बात) नहीं है (अर्थात्‌ अवश्य बताएगी) । इस (शकुन्तला) के द्वारा अनेक बार (बार-बार) मुड़कर अभिलाषा के साथ देखा गया भी मैं इस समय (इसका उत्तर) सुनने के लिये अधीरता को प्राप्त हो गया हूँ (अर्थात्‌ यह क्या उत्तर देती है - यह सुनने के लिये मैं अधीर हो गया हूँ) ।
शकुन्तला:-- सखी, जब से तपोवन की रक्षा करने वाले वे राजर्षि मेरी दृष्टि में आये हैं... (इस प्रकार आधा कहने पर लज्जा का अभिनय करती है) । दोनों:-- प्रिय सखी कहो । शकुन्तला:-- तब से लेकर (तभी से) उनसे सम्बद्ध अभिलाषा (अनुराग) के कारण मैं इस अवस्था को प्राप्त हो गयी हूँ । राजा:-- (प्रसत्रतापूर्वक) (जो) सुनने योग्य (था) (वह) सुन लिया । ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति पर प्राणियों के लिये बादलों से (आच्छन्न) दिन की भाँति, कामदेव ही मेरे सन्ताप का कारण (था) और वही (कामदेव) (अब मुझे) शान्ति प्रदान करने वाला हो गया है ।
शकुन्तला:-- यदि तुम दोनों की अनुमति हो तो वैसा प्रयत्न करो जिस प्रकार मैं उस राजर्षि (दुष्यन्त) की कृपापात्र बन जाऊं । नहीं तो अवश्य ही (मैं मर जाऊंगी और तुम लोगो को) मुझे तिल-मिश्रित जल (तिलाञ्जलि) देना होगा । राजा:-- (इसका यह) वचन सन्देह को दूर करने वाला है । प्रियवंदा:-- (हाथ की ओट में) जिसका काम-भाव बहुत बढ़ गया है ऐसी यह (शकुन्तला) विलम्ब को सहन करने में असमर्थ है । जिस पर यह आसक्त है, वह पुरुवंशियों का प्रधान (शिरोमणि) है । इसलिये इसकी अभिलाषा का अनुमोदन करना (ही) उचित है । (अर्थात्‌ इसकी अभिलाषा सर्वथा अभिनन्दनीय है) । अनसूया:-- जैसा (तुम) कह रहीं हो, वैसा (ही किया जायेगा) । प्रियवंदा:-- (प्रकट रूप में) सखी, सोभाग्य से तुम्हारी प्रेमासक्ति (तुम्हारे) अनुकूल ही है (जो कि तुम राजा को चाहती हो) । अथवा महानदी समुद्र को छोड़कर ओर कहाँ गिरती (मिलती) है । सम्प्रति आप्र-वृक्ष के बिना ओर कौन (वृक्ष) पल्लवों से युक्त माधवी लता को सहारा दे सकता है । राजा:-- इसमें क्या आश्चर्य है, यदि विशाखा (नामक) तारिकायें (नक्षत्र) चन्द्रकला का अनुसरण (अनुमोदन) करती है । अनसूया:-- फिर कौन उपाय हो सकता है, जिससे (हम लोग) शीघ्र गुप्त रूप से सखी (शकुन्तला) के मनोरथ को पूरा कर सकते हैं । प्रियंवदा:-- गुप्त रूप से (कार्य कैसे होगा) - यह सोचना है । शीघ्र (कार्य करना) यह (तो) सरल है । अनसूया:-- कैसे ? प्रियंवदा:-- निश्चय ही वे राजर्षि इस (शकुन्तला) के प्रति स्नेहयुक्त दृष्टि से अपनी अभिलाषा प्रकट कर चुके हैं और इन दिनों (रात्रि में) जागरण के कारण दुर्बल दिखायी दे रहे हैं । राजा:-- सचमुच ऐसा ही हो गया हूँ । क्योकि (बायीं) भुजा पर रखे गये नेत्र के प्रान्त-भाग (कोने) से बहने वाले और आन्तरिक सन्ताप (मनस्ताप) के कारण उष्ण (गर्म) आंसुओं से धूमिल मणियों वाला और प्रत्यञ्चा (धनुष की डोरी) के आघात (रगड़) के चिह्न को स्पर्श न करता हुआ कलाई से बार-बार सरका हआ यह स्वर्ण कङ्गन मेरे द्वारा पुनः-पुनः (ऊपर) सरकाया जाता है ।
प्रियवंदा:-- (सोचकर) सखी, इस (राजा दुष्यन्त) के लिये (शकुन्तला के द्वारा) मदनलेख (प्रेम-पत्र) लिखवाओ । उस (प्रेम-पत्र) को फूलों मे छिपाकर देवता के प्रसाद्‌ के बहाने से मैं उस (राजा दुष्यन्त) के हाथ में पहंचा दूंगी । अनसूया:-- यह सुकुमार (सुगम) प्रयोग (उपाय) मुझे पसन्द है । किन्तु शकुन्तला क्या कहती है (अर्थात्‌ उसका क्या विचार है) ? शकुन्तला:-- क्या तुम दोनो की आज्ञा टाली जा सकती है (अर्थात्‌ नहीं टाली जा सकती है) | प्रियवंदा:-- तो अपना उल्लेख करते हुए कोई ललित-पदों वाली रचना (बन्धन) सोचो । शकुन्तला:-- सखी, मैं सोचती हूँ । (किन्तु) तिरस्कार से भीत मेरा हृदय कांप रहा है । राजा:-- (प्रसन्रतापूर्वक) हे भयशीले (भयालु) जिससे तुम तिरस्कार (अनादर) की अशंका करती हो, वही यह (दुष्यन्त) तुम्हारे मिलन के लिये उत्कण्ठित खड़ा है । प्रार्थना करने वाला (लक्ष्मी को चाहने वाला) व्यक्ति लक्ष्मी को प्राप्त करे अथवा न (करे), किन्तु लक्ष्मी के द्वारा चाहा गया व्यक्ति (लक्ष्मी के लिये) भला कैसे दुर्लभ हो सकता है ?
दोनों सखियाँ:-- अरी अपने गुणों क अवमानना (तिरस्कार) करने वाली, (अपने) शरीर को शान्ति देने वाली शरत्कालीन चाँदनी को अब कौन (अपने) वस्त्र के छोर (आंचल) से रोकता है ? (अर्थात्‌ कोई नहीं रोकता) । शकुन्तला:-- (मुस्कराकर) तो मैं अब (परम-पत्र लिखने के कार्य मैं) लगती हूँ । (बैठकर सोचती है) । राजा:-- सुअवसर (स्थाने) पर अपलक नयनो से (अपनी) प्रियतमा (शकुन्तला) को देख रहा हूँ । क्योकि (प्रेम-पत्र के) पदों की रचना करती हुई इस (शकुन्तला) का उठायी गयी एक भोंह से युक्त मुख रोमाञ्चित कपोल से मेरे प्रति अनुराग को प्रकट कर रहा है ।
शकुन्तला:-- सखी, मेरे द्वारा पद्य (गीत) की वस्तु (भाव) सोच ली गयी है । किन्तु लिखने का साधन (यहाँ) विद्यमान नहीं है । प्रियंवदा:-- तोते के उद्रभाग की भाँति सुकोमल इस कमलिनी के पत्ते पर नखों के द्वारा वर्णों (अक्षरों) को अंकित कर दो । शकुन्तला:-- (पूर्वोक्त के अनुसार लिखने का अभिनय कर) सखियों, अब सुनो, (यह पद्य) उचित अर्थ वाला है, अथवा नहीं । दोनों:-- हम दोनों (सुनने के लिये) सावधान हैं । शकुन्तला:-- (पढ़ती है) हे निर्दय, तुम्हारे हृदय को मैं नहीं जानती हूं, (किन्तु) तुम्हारे प्रति उत्पन्न अभिलाषा से युक्त मेरे अंगों को कामदेव दिन-रात अत्यधिक तपा रहा है (पीड़ित कर रहा है) ।
राजा:-- (सहसा समीप जाकर) हे तन्वद्गी, कामदेव निरन्तर (रात-दिन) तुम्हे तपा (ही) रहा हे, (किन्तु) मुझे तो भस्म ही कर डाल रहा है । दिन जिस प्रकार चन्द्रमा को क्षीण (प्रभा-हीन) बना देता है, उस प्रकार कुमुदिनी को निश्चय ही (प्रभा-हीन) नहीं बनाता ।
दोनों सखियां:-- (देखकर और प्रसन्नतापूर्वक उठकर) विलम्ब न करने वाले मनोरथ (स्वरूप आप) का स्वागत है । (शकुन्तला उठकर खड़ी होना चाहती है) राजा:-- कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है । फूलों की शय्या को चिपकाये हुए (अर्थात्‌ फूलों की शय्या को परिमर्दित करने वाले), शीघ्र मुरझाये हुए कमल-नाल के टुकड़ों से सुगन्धित और अत्यधिक सन्तप्त तुम्हारे अंग ओपचारिकता (शिष्टाचार) के योग्य नहीं हैं ।
अनसूया:-- प्रियमित्र (आप) इधर शिला-तल के एक भाग को सुशोभित करें (अर्थात्‌ शिला-तल पर एक ओर आप बैठें) । (राजा बैठता है । शकुन्तला लज्जापूर्वक बैठी रहती है) । प्रियंवदा:-- आप दोनों का परस्पर अनुराग (प्रेम) प्रत्यक्ष (प्रकट) ही है । किन्तु सखी के प्रति मेरा स्नेह मुझे प्रकट बात को फिर कहने के लिये प्रेरित कर रहा है । राजा:-- भद्रे, इसे रोकना नहीं चाहिये । (अर्थात्‌ जो कहना है, उसे अवश्य कहिये) । क्योकि (विवक्षित कहने के लिये इच्छित) बात न कही जाने पर पश्चात्ताप उत्पन्न करती है । प्रियंवदा:-- राजा को (अपने) राज्य में निवास करने वाले आपत्ति-ग्रस्त व्यक्ति के कष्टों को दूर करने वाला होना चाहिये । यह आप का कर्तव्य है । राजा:-- इससे बड़ा ओर कोई (राजा का कर्तव्य) नहीं है । प्रियंवदा:-- तो हम लोगो की यह प्रियसखी (शकुन्तला) आप को उदेश्य कर (आप के कारण) कामदेव के द्वारा इस अवस्था को प्राप्त करायी (पहुंचायी) गयी है । तो आप अनुग्रह पूर्वक इस (शकुन्तला) के जीवन की रक्षा करने के योग्य हैँ (अर्थात्‌ आप अनुग्रह पूर्वक इसके जीवन की रक्षा करें) । राजा:-- भद्रे, यह याचना (प्रार्थना) (दोनों ओर से) समान (साधारण) है अर्थात्‌ दोनों को एक दूसरे की रक्षा करनी चाहिये । मैं सर्वथा (आप लोगों का) अनुगृहीत हूँ । शकुन्तला:-- (प्रियंवदा को देखकर) सखी, अन्तःपुर की स्त्रियों के वियोग से उत्कण्ठित राजर्षि को रोकने से क्या (लाभ है) (अर्थात्‌ उन्हे क्यों रोकती हो) ? राजा:-- हे मादक (मतवाले) नेत्रों वाली (मेरे) हदय में विराजमान (प्रिय शकुन्तले), केवल तुम्हारे में ही आसक्त इस मेरे हदय को यदि तुम अन्यथा (अर्थात्‌ दूसरे में आसक्त) समझती हो (तो) कामदेव के बाणों से हत (मारा हआ) मैं फिर (तुम्हारे द्वारा) मार दिया गया (हूँ) । अनसूया:-- मित्र, राजा लोग बहुत पत्नियों वाले सुने जाते हँ (अर्थात्‌ राजाओं की बहुत सी पत्नियां होती हैं) । इसलिये वैसा व्यवहार कीजियेगा, जिससे हम लोगों की प्रियसखी (शकुन्तला) बन्धुजनों (सगे सम्बन्धियों) के लिये शोचनीय (चिन्ता का कारण) न हो । राजा:-- भद्रे, अधिक कहने से क्या (लाभ) ? अनुवाद्‌:-- अनेक पत्नियों के होने पर भी मेरे कुल (वंश) की दो प्रतिष्ठा (के आधार) हैं - सागररूपी मेखला वाली (समुद्र से घिरी हई) पृथ्वी और आप दोनों की यह सखी (शकुन्तला) ।
दोनो:-- हम दोनों आनन्दित (निश्चिन्त) हो गयीं । प्रियंवदा:-- (दूसरी ओर देखकर) अनसूया, इधर की ओर दृष्टि डालता हआ (देखता हुआ) यह हरिण का बच्चा जैसे (अपनी) माँ को खोज रहा है । आओ, इसको (इसकी माँ से) मिला दें । (दोनों जाने लगती हैँ) । शकुन्तला:-- सखी, मैं असहाय (अकेली) (रह गयी) हूँ । तुम दोनों में से कोई एक (यहाँ) आओ । दोनों:-- जो पृथ्वी का आश्रय (सहारा-रक्षक) है, वह तुम्हारे पास है (इसलिये दूसरे रक्षक की क्या आवश्यकता है) । (दोनों निकल जाती हैँ) शकुन्तला:-- क्या चली ही गयीं ? राजा:-- घबराने की आवश्यकता नहीं । यह (तुम्हारा) सेवक व्यक्ति तो तुम्हारे पास ही है । क्या शीतल और थकान को दूर करने वाले कमलिनी के पत्तों के बने पद्ध से ठण्डी हवा डुलाऊ ? अथवा हे हाथी के बच्चे के सूंड के समान जाँघों वाली (शकुन्तला), तुम्हारे कमल के समान लाल पैरों को (अपनी) गोद मे रखकर सुखपूर्वक उन्हे दबाऊं ।
शकुन्तला:-- मैं आदरणीय लोगों के प्रति अपने को अपराधिनी नहीं बनाऊंगी । (उठकर जाना चाहती है) । राजा:-- सुन्दरी, दिन (अभी) ढला नहीं (अनिर्वाण) है । और तुम्हारे शरीर की यह दशा है । कमलिनी के पत्तों से बनाये गये स्तनों के आवरण वाली पुष्प-शय्या को छोड़कर पीड़ा के कारण कोमल अंगों से धूप में कैसे जाओगी ? (बलपूर्वक इसको लौटाता है) ।
शकुन्तला:-- हे पुरुवंशी राजन्‌ , मर्यादा की रक्षा कीजिये । काम से पीड़ित होते हए भी मैं अपनी स्वामिनी नहीं हूँ । (अर्थात्‌ स्वतन्त्र नहीं हूँ) । राजा:-- अरी डरपोक, गुरुजनों से भयभीत न हो । तुम्हे देखकर धर्म को जानने वाले पूज्य कुलपति (कण्व) इस विषय में (विवाह के विषय में) बुरा (दोष) नहीं मानेंगे । और भी बहुत सी राजर्षियों की कन्यायें गान्धर्व विवाह के द्वारा विवाहित हुई हैं और वे पिता आदि के द्वारा अनुमोदित भी की गयी हैं - (ऐसा) सुना जाता है ।
शकुन्तला:-- मुझे अभी छोडिये । फिर मैं (अपनी) सखियों से अनुमति लूंगी । राजा:-- अच्छा, छोड दूंगा । शकुन्तला:-- कब ? हे सुन्दरी, जब भ्रमर (भौंरे) के द्वारा नीवन पुष्प (के रस) की भाँति, प्यासे मेरे द्वारा अक्षत (न चूमे गये) और कोमल तुम्हारे इस अधर का रस दयापूर्वक (धीरे-धीरे) ग्रहण कर लिया (पी लिया) जायेगा (तब छोड़ूंगा) ।
(इसका मुंह उठाना चाहता है । शकुन्तला अभिनयपूर्वक रोकती है) (नेपथ्य में) हे चकवी (चक्रवाक-वधू), अपने साथी (चकवे) को विदा करो । रात आ गयी (हो गयी) है । शकुन्तला:-- (घबराहट के साथ) हे पुरुवंशी राजन्‌ , निःसन्देह मेरे शरीर का समाचार जानने के लिये आर्य गौतमी इधर ही आ रही हैं । इसलिये शाखाओं (डालियो) की ओट (आड़) मे छिप जाइये । राजा:-- (जैसा आप कहती हैं) । वैसा (ही करता हूँ) । (अपने को छिपाकर खड़ा हो जाता है) । (तत्पश्चात्‌ पात्र लिये हुये गोतमी और दोनों सखियाँ प्रवेशा करती हैं) दोनों सखियां:-- आर्या गोतमी, इधर से, इधर से (आइये) । गौतमी:-- (शकुन्तला के समीप जाकर) पुत्री, तुम्हारे अंगों का सन्ताप कुछ कम हुआ ? शकुन्तला:-- आर्या मुझे कुछ अन्तर (लाभ) है । गौतमी:-- इस कुश-युक्त जल से तुम्हारा शरीर पूर्ण स्वस्थ (सन्तापरहित) हो जायेगा । (शकुन्तला के सिर पर जल छिड़ककर) बेटी, दिन ढल गया है । आओ, कुटी पर ही चलें । (सभी चल देती हैं) । शकुन्तला:-- (अपने मन में) हे हदय, पहले तो (दुष्यन्त रूप) मनोरथ के अनायास प्राप्त होने पर (तुमने अपना) संकोच (कातरभावः) नहीं छोड़ा । अब पश्चात्ताप के साथ वियुक्त होते हुये (बिछड़ते हुये) (तुमको) क्यों सन्ताप (हो रहा है) ? कुछ पग चलने के बाद रुक कर (प्रकट रूप में) हे सन्ताप को दूर करने वाले लताकुञ्च, तुमको फिर सेवन (उपभोग) के लिये निमन्त्रित कर रही हूँ । (शकुन्तला दुखपूर्वक दूसरों के साथ चली जाती है) । राजा:-- (पहले वाले स्थान पर जाकर, लम्बी सांस लेकर) अहो, अभीष्ट (अभिलषित) वस्तुओं की प्राप्ति विघ्नो (बाधाओं) से युक्त होती है । क्योंकि मेरे द्वारा सुन्दर नेत्रों वाली (शकुन्तला) का बार-बार उंगली (तर्जनी) से ठके हुए अधरोष्ठ वाला, (चुम्बनादि के) निषेध (मना करने) के अक्षरों के अस्पष्ट उच्चारण करने के कारण मनोहर और (उसके द्वारा) कन्धों की ओर मोड़ा गया मुख (मेरे द्वारा) किसी प्रकार (अर्थात्‌ बड़ी कठिनाई से) ऊपर उठाया गया किन्तु चूमा नहीं जा सका (अर्थात्‌ मैंने उसके मुख को ऊपर तो उठा लिया, किन्तु चुम्बन नहीं कर पाया ।
तो इस समय कहां जाऊं ? अथवा यहां ही प्रियतमा (शकुन्तला) के द्वारा उपभुक्त और (अब) परित्यक्त (शकुन्तला से विहीन) लतामण्डप में थोड़ी देर रुकूँगा । (चारो ओर देखकर) शिला पर उस (प्रियतमा शकृन्तला) के शरीर से मर्दित (मसली) गयी यह पुष्प-निर्मित शय्या (है) । कमलिनी के पत्ते पर नाखून के द्वारा लिखित (अङ्कित) यह (उसका) मुरझाया हुआ काम-पत्र (प्रेम-पत्र) (है) । (उसके) हाथ से गिरा हुआ यह कमल-नाल का निर्मित आभूषण (कंगन) है । इस प्रकार (इन वस्तुओं में) संलग्न (आसक्त) दृष्टि वाला मैं (प्रियतमा शकुन्तला से) सूने भी इस बेंत-गृह (बेंत-लतागृह) से एकाएक निकलने (बाहर जाने) में असमर्थ हूँ ।
(आकाश में) हे राजन्‌ , सायंकालीन यज्ञ-कर्म के प्रारम्भ होने पर अग्नि से युक्त यज्ञ-वेदी के चारों ओर व्याप्त (फैली हुई), सायंकालिक बादलों के समान लाल-काली और भय को उत्पन्न करने वाली, कच्चे मांस का आहार करने वाले राक्षसों की छाया अनेक प्रकार से (विविध रूपों में) विचरण कर रही है । राजा:-- यह मैं (अभी) आता हूँ । (निकल जाता है) । ॥ तृतीय अङ्क समाप्त ॥
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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