दोनो:--
हम दोनों आनन्दित (निश्चिन्त) हो गयीं ।
प्रियंवदा:--
(दूसरी ओर देखकर) अनसूया, इधर की ओर दृष्टि डालता हआ (देखता हुआ) यह हरिण का बच्चा जैसे (अपनी) माँ को खोज रहा है । आओ, इसको (इसकी माँ से) मिला दें । (दोनों जाने लगती हैँ) ।
शकुन्तला:--
सखी, मैं असहाय (अकेली) (रह गयी) हूँ । तुम दोनों में से कोई एक (यहाँ) आओ ।
दोनों:--
जो पृथ्वी का आश्रय (सहारा-रक्षक) है, वह तुम्हारे पास है (इसलिये दूसरे रक्षक की क्या आवश्यकता है) । (दोनों निकल जाती हैँ)
शकुन्तला:--
क्या चली ही गयीं ?
राजा:--
घबराने की आवश्यकता नहीं । यह (तुम्हारा) सेवक व्यक्ति तो तुम्हारे पास ही है । क्या शीतल और थकान को दूर करने वाले कमलिनी के पत्तों के बने पद्ध से ठण्डी हवा डुलाऊ ? अथवा हे हाथी के बच्चे के सूंड के समान जाँघों वाली (शकुन्तला), तुम्हारे कमल के समान लाल पैरों को (अपनी) गोद मे रखकर सुखपूर्वक उन्हे दबाऊं ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।