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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 17
उभे-- निरदूति स्वः । प्रियंवदा-(सद्ष्िक्षेपम्‌) अनसूये, यथैष इतो दत्तदृष्टिरुत्सुको मृगपोतको मातरमन्विष्यति । एहि, संयोजयाव एनम्‌ । शकुन्तला-हला, अशरणाऽस्मि । अन्यतरा युवयोरागच्छतु । उभे-- पृथिव्या यः शरणं ख तव समीपे वत्ति । शकुन्तला-- कथं गते एव ? राजा-- अलमावेगेन । नन्वयमाराधयिता जनस्तव समीपे वर्तते । किं शीतलैः क्लमविनोदिभिरा्र॑वातान्‌ सञ्चारयामि नलिनीदलतालवृन्तैः । अङ्के निधाय करभोरु यथासुखं ते संवाहयामि चरणावुत पडताग्रौ ।।
दोनो:-- हम दोनों आनन्दित (निश्चिन्त) हो गयीं । प्रियंवदा:-- (दूसरी ओर देखकर) अनसूया, इधर की ओर दृष्टि डालता हआ (देखता हुआ) यह हरिण का बच्चा जैसे (अपनी) माँ को खोज रहा है । आओ, इसको (इसकी माँ से) मिला दें । (दोनों जाने लगती हैँ) । शकुन्तला:-- सखी, मैं असहाय (अकेली) (रह गयी) हूँ । तुम दोनों में से कोई एक (यहाँ) आओ । दोनों:-- जो पृथ्वी का आश्रय (सहारा-रक्षक) है, वह तुम्हारे पास है (इसलिये दूसरे रक्षक की क्या आवश्यकता है) । (दोनों निकल जाती हैँ) शकुन्तला:-- क्या चली ही गयीं ? राजा:-- घबराने की आवश्यकता नहीं । यह (तुम्हारा) सेवक व्यक्ति तो तुम्हारे पास ही है । क्या शीतल और थकान को दूर करने वाले कमलिनी के पत्तों के बने पद्ध से ठण्डी हवा डुलाऊ ? अथवा हे हाथी के बच्चे के सूंड के समान जाँघों वाली (शकुन्तला), तुम्हारे कमल के समान लाल पैरों को (अपनी) गोद मे रखकर सुखपूर्वक उन्हे दबाऊं ।
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