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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 19
शकुन्तला-- पौरव, रक्ष विनयम्‌ । मदनसन्तप्ताऽपि न खल्वात्मनः प्रभवामि । राजा-- भीरु, अलं गुरुजन भयेन । दष्ट्वा ते विदितधर्मा तत्रभवान्नात्र दोषं ग्रहीष्यति कुलपतिः । अपि च-- ण विवाहेन बह्वयो राजर्षिकन्यकाः । श्रूयन्ते परिणीतास्ताः पितृभिश्चाभिनन्दिताः ।।
शकुन्तला:-- हे पुरुवंशी राजन्‌ , मर्यादा की रक्षा कीजिये । काम से पीड़ित होते हए भी मैं अपनी स्वामिनी नहीं हूँ । (अर्थात्‌ स्वतन्त्र नहीं हूँ) । राजा:-- अरी डरपोक, गुरुजनों से भयभीत न हो । तुम्हे देखकर धर्म को जानने वाले पूज्य कुलपति (कण्व) इस विषय में (विवाह के विषय में) बुरा (दोष) नहीं मानेंगे । और भी बहुत सी राजर्षियों की कन्यायें गान्धर्व विवाह के द्वारा विवाहित हुई हैं और वे पिता आदि के द्वारा अनुमोदित भी की गयी हैं - (ऐसा) सुना जाता है ।
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