सख्यो-(विलोक्य सहर्षमुत्थाय) स्वागतमविलम्बिनो मनोरथस्य ।
(शकुन्तला भ्युत्थातुमिच्छति)
राजा--अलमलमायासेन । सन्दष्टकुसुमशयनान्याशुक्लान्तविसभङ्गसुर भीणि । गुरुपरितापानि न ते गात्राण्युपचारमर्हन्ति ।।
दोनों सखियां:--
(देखकर और प्रसन्नतापूर्वक उठकर) विलम्ब न करने वाले मनोरथ (स्वरूप आप) का स्वागत है ।
(शकुन्तला उठकर खड़ी होना चाहती है)
राजा:--
कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है । फूलों की शय्या को चिपकाये हुए (अर्थात् फूलों की शय्या को परिमर्दित करने वाले), शीघ्र मुरझाये हुए कमल-नाल के टुकड़ों से सुगन्धित और अत्यधिक सन्तप्त तुम्हारे अंग ओपचारिकता (शिष्टाचार) के योग्य नहीं हैं ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।