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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 5
(परिक्रम्यावलोक्य च) अस्मिन्‌ वेतसपरिक्षिप्ते लतामण्डपे सन्निहितया शकुन्तलया भवितव्यम्‌ । तथा हि-- अभ्युन्नता पुरस्तादवगाढा जघनगौरवात्‌ पश्चात्‌ । द्वारेऽस्य पाण्डुसिकते पदपदिक्तर्दृश्यतेऽभिनवा ।।
(घूमकर और देखकर) बेंत से घिरे हए इस लतामण्डप में शकुन्तला को होना चाहिये । क्योकि पीले बालू (रेत) वाले इस (लतापमण्डप) के द्वार पर आगे की ओर उठी हुई (उभरी हुई) और नितम्बों के भार के कारण पीछे की ओर गहरी (धंसी हुई) नयी (अभी-अभी बनी हुई) पदचिन्हों की पंक्ति दिखायी दे रही है ।
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