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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 8
शकुन्तला-सखि, कस्य वान्यस्य कथयिष्यामि । किन्त्वायासयित्रीदानीं वां भविष्यामि । उभे--अत एव खलु निर्बन्धः । स्िग्धजनसंवि भक्तं हि दुःख सह्यवेदनं भवति । राजा- पृष्ठा जनेन समदुःखसुखेन बाला नेयं न॒ वक्ष्यति मनोगतमाधिहेतुम्‌ । दृष्टो विवृत्य बहुजञोऽच्यनया सतृष्ण मत्रान्तरे श्रवणकातरतां गतोऽस्मि।।
शकुन्तला:-- सखी, भला ओर किससे (अपनी दशा) बताऊंगी ? किन्तु अब (बताकर) मैं तुम दोनों को कष्ट देने वाली (ही) होऊंगी । दोनों:-- इसीलिये तो आग्रह (किया जा रहा) है । क्योकि स्नेही लोगों से बांटे गये (बताये गये) दुख की पीड़ा सह्य हो जाती है । राजा:-- दुख और सुख मे समान रहने वाले (अर्थात्‌ दुख और सुख की साथी) व्यक्तियों (सखियों) के द्वारा पूछी गयी यह किशोरी (शकुन्तला) मानसिक (अपने मन के) दुख के कारण को नहीं बतायेगी (ऐसी बात) नहीं है (अर्थात्‌ अवश्य बताएगी) । इस (शकुन्तला) के द्वारा अनेक बार (बार-बार) मुड़कर अभिलाषा के साथ देखा गया भी मैं इस समय (इसका उत्तर) सुनने के लिये अधीरता को प्राप्त हो गया हूँ (अर्थात्‌ यह क्या उत्तर देती है - यह सुनने के लिये मैं अधीर हो गया हूँ) ।
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