दोनों सखियाँ:--
अरी अपने गुणों क अवमानना (तिरस्कार) करने वाली, (अपने) शरीर को शान्ति देने वाली शरत्कालीन चाँदनी को अब कौन (अपने) वस्त्र के छोर (आंचल) से रोकता है ? (अर्थात् कोई नहीं रोकता) ।
शकुन्तला:--
(मुस्कराकर) तो मैं अब (परम-पत्र लिखने के कार्य मैं) लगती हूँ । (बैठकर सोचती है) ।
राजा:--
सुअवसर (स्थाने) पर अपलक नयनो से (अपनी) प्रियतमा (शकुन्तला) को देख रहा हूँ । क्योकि (प्रेम-पत्र के) पदों की रचना करती हुई इस (शकुन्तला) का उठायी गयी एक भोंह से युक्त मुख रोमाञ्चित कपोल से मेरे प्रति अनुराग को प्रकट कर रहा है ।
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