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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 12
सख्यौ-अयि आत्मगुणावमानिनि, क इदानीं शरीरनिवपिायित्रीं शारदीं ज्योत्स्नां ` पटान्तेन वारयति । शकुन्तला-- (सस्मितम्‌) नियोजितेदानीमस्मि । राजा-- स्थाने खलु विस्मृतनिमेषेण चकषुषा प्रियामवलोकयामि । यतः-- उन्नमितैक भ्रूलतमाननमस्याः पदानि रचयन्त्याः । कण्टकितेन प्रथयति मय्यनुरागं कपोलेन ।।
दोनों सखियाँ:-- अरी अपने गुणों क अवमानना (तिरस्कार) करने वाली, (अपने) शरीर को शान्ति देने वाली शरत्कालीन चाँदनी को अब कौन (अपने) वस्त्र के छोर (आंचल) से रोकता है ? (अर्थात्‌ कोई नहीं रोकता) । शकुन्तला:-- (मुस्कराकर) तो मैं अब (परम-पत्र लिखने के कार्य मैं) लगती हूँ । (बैठकर सोचती है) । राजा:-- सुअवसर (स्थाने) पर अपलक नयनो से (अपनी) प्रियतमा (शकुन्तला) को देख रहा हूँ । क्योकि (प्रेम-पत्र के) पदों की रचना करती हुई इस (शकुन्तला) का उठायी गयी एक भोंह से युक्त मुख रोमाञ्चित कपोल से मेरे प्रति अनुराग को प्रकट कर रहा है ।
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