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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 10
शकुन्तला- तद्यदि वामनुमतं, तथा वर्तेथां यथा तस्य राजर्षेरनुकम्पनीया भवामि । अन्यथाऽ वश्यं सिञ्चतं मे तिलोदकम्‌ । राजा- संशयच्छेदि वचनम्‌ । प्रियंवदा- (जनान्तिकम्‌) अनसूये, दूरगतमन्मथाऽ क्षमेयं कालहरणस्य । यस्मिन्‌ बद्धभावैषा, स ललामभूतः पौरवाणाम्‌ । तत्‌ युक्तमस्या अभिलाषोऽभिनन्दितुम्‌ । अनसूया- तथा यथा भणसि । प्रियवंदा- (प्रकाशम्‌) सखि, दिष्ट्याऽनुरूपस्तेऽभिनिवेशः । सागरमुज््ित्वा कुत्र वा महानद्यदवरति । क इदानीं सहकारमन्तरेणातिमुक्तलतां पल्लवितां सहते । राजा--किमत्र चित्रं यदि विशाखे शशाङ्कलेखामनुवर्तेते । अनसूया--कः पुनरुपायो भवेद्‌ येनाविलम्बितं निभृतं च सख्या मनोरथं सम्पादयावः । प्रियवंदा- निभृतमिति चिन्तनीय भवेत्‌ । शीघ्रमिति सुकरम्‌ । अनसुया- कथमिव ? प्रियवंदा-ननु स राजर्षिरस्यां स्निग्धदृष्ट्या सुचिताभिलाष एतान्‌ दिवसान्‌ प्राजगरकृशो लक्ष्यते । राजा--सत्यमित्थभूत एवास्मि । तथाहि-- इदमशिशिरैरन्तस्तापाद्‌ विवर्णमणीकृतं निशि निशि भुजन्यस्तापाङ्गप्रसारिभिरश्रुभिः । अनभिलुलितज्याघाताङ्खं मुहूर्मणिबन्धनात्‌ ` कनकवलयं स्रस्तं ॒स्रस्तं मया प्रतिसार्यति ।।
शकुन्तला:-- यदि तुम दोनों की अनुमति हो तो वैसा प्रयत्न करो जिस प्रकार मैं उस राजर्षि (दुष्यन्त) की कृपापात्र बन जाऊं । नहीं तो अवश्य ही (मैं मर जाऊंगी और तुम लोगो को) मुझे तिल-मिश्रित जल (तिलाञ्जलि) देना होगा । राजा:-- (इसका यह) वचन सन्देह को दूर करने वाला है । प्रियवंदा:-- (हाथ की ओट में) जिसका काम-भाव बहुत बढ़ गया है ऐसी यह (शकुन्तला) विलम्ब को सहन करने में असमर्थ है । जिस पर यह आसक्त है, वह पुरुवंशियों का प्रधान (शिरोमणि) है । इसलिये इसकी अभिलाषा का अनुमोदन करना (ही) उचित है । (अर्थात्‌ इसकी अभिलाषा सर्वथा अभिनन्दनीय है) । अनसूया:-- जैसा (तुम) कह रहीं हो, वैसा (ही किया जायेगा) । प्रियवंदा:-- (प्रकट रूप में) सखी, सोभाग्य से तुम्हारी प्रेमासक्ति (तुम्हारे) अनुकूल ही है (जो कि तुम राजा को चाहती हो) । अथवा महानदी समुद्र को छोड़कर ओर कहाँ गिरती (मिलती) है । सम्प्रति आप्र-वृक्ष के बिना ओर कौन (वृक्ष) पल्लवों से युक्त माधवी लता को सहारा दे सकता है । राजा:-- इसमें क्या आश्चर्य है, यदि विशाखा (नामक) तारिकायें (नक्षत्र) चन्द्रकला का अनुसरण (अनुमोदन) करती है । अनसूया:-- फिर कौन उपाय हो सकता है, जिससे (हम लोग) शीघ्र गुप्त रूप से सखी (शकुन्तला) के मनोरथ को पूरा कर सकते हैं । प्रियंवदा:-- गुप्त रूप से (कार्य कैसे होगा) - यह सोचना है । शीघ्र (कार्य करना) यह (तो) सरल है । अनसूया:-- कैसे ? प्रियंवदा:-- निश्चय ही वे राजर्षि इस (शकुन्तला) के प्रति स्नेहयुक्त दृष्टि से अपनी अभिलाषा प्रकट कर चुके हैं और इन दिनों (रात्रि में) जागरण के कारण दुर्बल दिखायी दे रहे हैं । राजा:-- सचमुच ऐसा ही हो गया हूँ । क्योकि (बायीं) भुजा पर रखे गये नेत्र के प्रान्त-भाग (कोने) से बहने वाले और आन्तरिक सन्ताप (मनस्ताप) के कारण उष्ण (गर्म) आंसुओं से धूमिल मणियों वाला और प्रत्यञ्चा (धनुष की डोरी) के आघात (रगड़) के चिह्न को स्पर्श न करता हुआ कलाई से बार-बार सरका हआ यह स्वर्ण कङ्गन मेरे द्वारा पुनः-पुनः (ऊपर) सरकाया जाता है ।
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