शकुन्तला:--
यदि तुम दोनों की अनुमति हो तो वैसा प्रयत्न करो जिस प्रकार मैं उस राजर्षि (दुष्यन्त) की कृपापात्र बन जाऊं । नहीं तो अवश्य ही (मैं मर जाऊंगी और तुम लोगो को) मुझे तिल-मिश्रित जल (तिलाञ्जलि) देना होगा ।
राजा:--
(इसका यह) वचन सन्देह को दूर करने वाला है ।
प्रियवंदा:--
(हाथ की ओट में) जिसका काम-भाव बहुत बढ़ गया है ऐसी यह (शकुन्तला) विलम्ब को सहन करने में असमर्थ है । जिस पर यह आसक्त है, वह पुरुवंशियों का प्रधान (शिरोमणि) है । इसलिये इसकी अभिलाषा का अनुमोदन करना (ही) उचित है । (अर्थात् इसकी अभिलाषा सर्वथा अभिनन्दनीय है) ।
अनसूया:--
जैसा (तुम) कह रहीं हो, वैसा (ही किया जायेगा) ।
प्रियवंदा:--
(प्रकट रूप में) सखी, सोभाग्य से तुम्हारी प्रेमासक्ति (तुम्हारे) अनुकूल ही है (जो कि तुम राजा को चाहती हो) । अथवा महानदी समुद्र को छोड़कर ओर कहाँ गिरती (मिलती) है । सम्प्रति आप्र-वृक्ष के बिना ओर कौन (वृक्ष) पल्लवों से युक्त माधवी लता को सहारा दे सकता है ।
राजा:--
इसमें क्या आश्चर्य है, यदि विशाखा (नामक) तारिकायें (नक्षत्र) चन्द्रकला का अनुसरण (अनुमोदन) करती है ।
अनसूया:--
फिर कौन उपाय हो सकता है, जिससे (हम लोग) शीघ्र गुप्त रूप से सखी (शकुन्तला) के मनोरथ को पूरा कर सकते हैं ।
प्रियंवदा:--
गुप्त रूप से (कार्य कैसे होगा) - यह सोचना है । शीघ्र (कार्य करना) यह (तो) सरल है ।
अनसूया:--
कैसे ?
प्रियंवदा:--
निश्चय ही वे राजर्षि इस (शकुन्तला) के प्रति स्नेहयुक्त दृष्टि से अपनी अभिलाषा प्रकट कर चुके हैं और इन दिनों (रात्रि में) जागरण के कारण दुर्बल दिखायी दे रहे हैं ।
राजा:--
सचमुच ऐसा ही हो गया हूँ । क्योकि (बायीं) भुजा पर रखे गये नेत्र के प्रान्त-भाग (कोने) से बहने वाले और आन्तरिक सन्ताप (मनस्ताप) के कारण उष्ण (गर्म) आंसुओं से धूमिल मणियों वाला और प्रत्यञ्चा (धनुष की डोरी) के आघात (रगड़) के चिह्न को स्पर्श न करता हुआ कलाई से बार-बार सरका हआ यह स्वर्ण कङ्गन मेरे द्वारा पुनः-पुनः (ऊपर) सरकाया जाता है ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।