राजा-(सहसोपस॒त्य)
तपति तनुगात्रि मदनस्त्वामनिशं मां पुनर्दहत्येव । ग्लपयति यथा शशाङ्कं न तथा हि कुमुद्रतीं दिवसः ।।
राजा:--
(सहसा समीप जाकर) हे तन्वद्गी, कामदेव निरन्तर (रात-दिन) तुम्हे तपा (ही) रहा हे, (किन्तु) मुझे तो भस्म ही कर डाल रहा है । दिन जिस प्रकार चन्द्रमा को क्षीण (प्रभा-हीन) बना देता है, उस प्रकार कुमुदिनी को निश्चय ही (प्रभा-हीन) नहीं बनाता ।
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