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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 7
प्रियवदा- (जनान्तिकम्‌) अनसूये, तस्य राजर्षेः प्रथमदरनादारभ्य पर्युतसुकेव शकुन्तला । कि नु खल्वस्यास्तन्निमित्तोऽ यमातङ्को भवेत्‌ ? अनसूया- सखि, ममापीदृश्याशङ्का हदयस्य । भवतु । प्रक्ष्यामि तावदेनाम्‌ (प्रकाशम्‌) सखि, प्रष्टव्यासि किमपि । बलवान्‌ खलु ते सन्तापः । शकुन्तला-(पूरवार्धेन शयनादुत्थाय) हला, किं वक्तुकामासि ? (हला, किं वनतुकामासि ।) अनसूया- हला शकुन्तले, अनभ्यन्तरे खल्वावां मदनगतस्य वृत्तान्तस्य । किन्तु यादृशीतिहासनिबन्धेषु कामयमानानामवस्था श्रूयते तादृशीं तव पश्यामि । कथय किनिमित्तं ¦ ते सन्तापः ? विकारं खलु पर भार्थतोऽज्ञात्वाऽनारम्भः प्रतीकारस्य । राजा-- अनसूयामप्यनुगतो मदीयस्तर्कः नहि स्वाभिप्रायेण मे दशनम्‌ । शकुन्तला- (आत्मगतम्‌) बलवान्‌ खलु मेऽभिनिवेशः । इदानीमपि सहसैतयोर्न शक्रोमि निवेदयितुम्‌ । प्रियंवदा-सखि शकुन्तले, सुष्ठु एषा भणति । किमात्मन आतङ्कमुपेक्षसे । अनुदिवसं खलु परिहीयसेऽ ङ्गैः केवलं लावण्यमयी छाया त्वां न मुञ्चति । राजा--अवितथमाह प्रियंवदा । तथाहि-- मक्षामकपोलमाननमुरः काठिन्यमुक्तस्तनं मध्यः क्लान्ततरः प्रकामविनतावसौ छविः पाण्डुरा । शोच्या च प्रियदर्शना च मदनक््लिष्टेयमालक्ष्यते पत्राणामिव शोषणेन मरुता स्पृष्टा लता माधवी ।।
प्रियवदा:-- (हाथ की ओट में) अनसूया, उस राजर्षि के प्रथम दर्शन (के समय) से ही शकुन्तला उत्कण्ठित-सी रहती है । क्या इस (शकुन्तला) का यह रोग (सन्ताप) उस (राजर्षि) के ही कारण है ? अनसूया:-- सखी, मेरे मन की भी ऐसी ही अशंका है । अच्छा तो इस (शकुन्तला) से ही पूछती हूँ । (प्रकट रूप में) सखी, तुमसे कुछ पूछना है । (क्योकि) तुम्हारा सन्ताप बहुत प्रबल है । शकुन्तला:-- (ऊपर के आधे भाग के साथ बिस्तर से उठकर) सखी, क्या कहना चाहती हो ? अनसूया:-- सखी शकुन्तला, हम दोनों काम-सम्बन्धी (प्रेम-व्यापार सम्बन्धी) वृतांतो (बातों) से अनभिज्ञ हैं । किन्तु इतिहास की कथाओं में काम-पीड़ितों की जैसी अवस्था सुनी जाती है, मैं वैसी (ही) (अवस्था) तुम्हारी देख रही हूँ । बताओ, किस कारण से तुम्हारा सन्ताप है ? क्योकि रोग (विकार) को ठीक से जाने बिना उसकी चिकित्सा आरम्भ नहीं की जाती । राजा:-- अनसूया का भी मेरे जेसा विचार (जिज्ञासा) । (अर्थात्‌ जो विचार मेरे मन में है वैसा ही अनसूया का भी है) । मेरा विचार (दर्शन) अपने अभिप्राय से नहीं था । शकुन्तला:-- (अपने मन में) (राजा के प्रति) मेरी आसक्ति अति प्रबल है (किन्तु) अब भी (फिर भी) इन दोनों (अनसूया और प्रियंवदा) से बताने में असमर्थ हूँ । प्रियंवदा:-- सखी शकुन्तला, यह (अनसूया) ठीक कहती है । अपने रोग की उपेक्षा क्यों कर रही हो ? प्रतिदिन तुम अंगों से क्षीण (दुर्बल) होती जा रही हो (अर्थात्‌ तुम्हारे अंग दिनानुदिन क्षीण हो रहे हैं) । केवल सौन्दर्य से युक्त कान्ति (छाया) तुमको नहीं छोड रही है । राजा:-- प्रियंवदा ने सत्य (ठीक) कहा । क्योकि (इस शकुन्तला का) मुखमण्डल अत्यन्त क्षीण कपोलों वाला हो गया है (अर्थात्‌ दोनों कपोल धंस गये हैं), वक्षःस्थल कठोरता से रहित (ढीले) स्तनों वाला हो गया है (अर्थात्‌ वक्षःस्थल के दोनों स्तन ढीले पड़ गये हैं), कटिभाग अत्यन्त क्षीण (पतला) हो गया है, दोनों कन्धे अत्यधिक झुक गए हैं (तथा) (शरीर की) कान्ति पीली पड़ गयी है । (सम्प्रति) कामपीड़ित यह (शकुन्तला) पत्तों को सुखा देने वाली वायु के द्वारा छुयी गयी (झुलसी हई) वासन्तीलता की भाँति शोचनीय तथा देखने में प्रिय (सुन्दर) लग रही है । (अर्थात्‌ शारीरिक दृष्टि से शोचनीय होते हुए भी देखने में सुन्दर प्रतीत हो रही है) ।
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