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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 1
(ततः प्रतिति कुशानादाय यजमानशिष्यः) शिष्यः-- अहो, महानुभावः पार्थिवो दुष्यन्तः । यत्प्रविष्टमात्र एवाश्रमं तत्रभवति निरुपद्रवाणि नः कर्माणि संवृत्तानि । का कथा बाणसन्धाने ज्याशब्देनैव दूरतः । हृङ्कारेणेव धनुषः स हि विध्नानपोहति ।।
(तत्पश्चात्‌ कुशों को लेकर यजमान (कण्व) का शिष्य प्रवेश करता है) । शिष्य:-- ओह, राजा दुष्यन्त अत्यन्त प्रभावशाली हैं । उन महानुभाव के आश्रम में प्रवेश करते ही हमारे (धार्मिक यज्ञादि) कार्य निर्विघ्न होने लगे हैं । बाण चढ़ाने पर तो क्या कहना ( अर्थात्‌ बाण चढ़ाने की तो बात ही क्या है), क्योकि वह (राजा दुष्यन्त) दूर से प्रतयञ्चा के शब्द के द्वारा ही मानो धनुष की हङ्कार से विघ्नों (बाधाओं) को दूर कर देते हैं ।
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