मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 9
शकुन्तला- सखि, यतः प्रभृति मम दरनिपथमागतः स तपोवनरक्षिता राजर्षिः । उभे--कथयतु प्रियसखी । शकुन्तला- तत आरभ्य तद्गतेनाभिलाषेणैतदवस्थाऽस्मि संवृत्ता । राजा- (सहर्षम्‌) श्रुतं श्रोतव्यम्‌ । स्मर एव तापहेतुर्निरवापयिता स एव मे जातः । | | दिवस इवाभ्रश्यामस्तपात्यये जीवलोकस्य ।।
शकुन्तला:-- सखी, जब से तपोवन की रक्षा करने वाले वे राजर्षि मेरी दृष्टि में आये हैं... (इस प्रकार आधा कहने पर लज्जा का अभिनय करती है) । दोनों:-- प्रिय सखी कहो । शकुन्तला:-- तब से लेकर (तभी से) उनसे सम्बद्ध अभिलाषा (अनुराग) के कारण मैं इस अवस्था को प्राप्त हो गयी हूँ । राजा:-- (प्रसत्रतापूर्वक) (जो) सुनने योग्य (था) (वह) सुन लिया । ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति पर प्राणियों के लिये बादलों से (आच्छन्न) दिन की भाँति, कामदेव ही मेरे सन्ताप का कारण (था) और वही (कामदेव) (अब मुझे) शान्ति प्रदान करने वाला हो गया है ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें