तब तक शाखाओं के बीच से देखता हूँ । (घूमकर, वैसा ही करके (अर्थात् शाखाओं के बीच से देखकर प्रसत्नतापूर्वक) अहो, मेरे नेत्रों को परमानन्द प्राप्त हो गया । यह मेरी अभिलषित (मनचाही) प्रियतमा फूलों के बिछौने से युक्त शिलापट्ट पर लेटी हुई है और दो सखियों द्वारा (उसको) सेवा की जा रही है । अच्छा, इनके विश्वस्त (गोपनीय) वार्तालाप को सुनता हूँ । (देखता हुआ खड़ा रहता है) ।
(तत्पश्चात् पूर्वोक्त स्थिति में शकुन्तला दोनों सखियों के साथ प्रवेश करती है)
दोनों सखियां:--
(पंखे से हवा झूल कर स्नेहपूर्वक) सखी शकुन्तला, क्या कमलिनीपत्र (से बने पंखे) की हवा तुम्हे सुख दे रही है ?
शकुन्तला:--
सखियों, क्या (तुम दोनों) मुझे हवा (पंखा) झूल रही हो ?
(दोनों सखियाँ चिन्ता का अभिनय कर एक दूसरे की ओर देखने लगती हैं) ।
राजा:--
शकुन्तला अत्यन्त अस्वस्थ शरीर वाली दिखायी दे रही है । (विचारपूर्वक) तो क्या यह लू (आतप) का प्रभाव (दोष) है अथवा जैसा मेरे मन में है । (इच्छापूर्वक देखकर) अथवा (इस विषय) में सन्देह करना व्यर्थ है । प्रिय (शकुन्तला) का, स्तनो पर लगे हुये खस के लेप वाला तथा ढीले कमलनाल के एक कङ्कन वाला पीडित (अस्वस्थ) यह शरीर क्या ही मनोहर (है) (सचमुच) युवतियों पर कामदेव और लू के सञ्चार का सन्ताप भले ही समान (हो), किन्तु लू का सन्ताप ऐसा सोन्दर्यवर्धक (मनोहर) नहीं (होता) ।
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