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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 6
यावद्‌ विटपान्तरेणावलोकयामि । (परिक्रम्य, तथा कृत्वा, सहर्षम्‌) अये, लब्धं नेत्रनिर्वाणम्‌ । एषा मे मनोरथप्रियतमा सकुसुमास्तरणं शिलापटमधिशायाना सखीभ्यामन्वास्यते । भवतु । श्रोष्याम्यासां विश्रम्भकथितानि । (इति विलोकयन्‌ स्थितः) । (ततः प्रविशति यथोक्तव्यापारा सह सखीभ्यां शकुन्तला) सख्यौ- (उपवीज्य सस्नेहम्‌) हला शकुन्तले, अपि सुखयति ते नलिनीपत्रवातः? (हला सउन्दले, अवि सुहअदि दे णलिणीपत्तवादो ?) शकुन्तला- कि वीजयतो मां सख्यौ ? (किं वीअअन्ति मं सहीओ ?) (सख्यौ विषादं नाटयित्वा परस्परमवलोकयतः) राजा- बलवदस्वस्थशरीरा शकुन्तला दृश्यते । (सवितर्कम्‌) तत्किमयमातपदोषः स्यात्‌ , उत यथा मे मनसि वति । (साभिलाषं निर्वर्ण्य) अथवा कृतं सन्देहेन । स्तनन्यस्तोशीरं प्रशिथिलमणालैकवलयं प्रियायाः साबाधं किमपि कमनीयं वपुरिदम्‌ । समस्तापः कामं मनसिजनिदाघप्रसरयोन तु ग्रीष्मस्यैवं सुभगमपराद्धं युवतिषु ।।
तब तक शाखाओं के बीच से देखता हूँ । (घूमकर, वैसा ही करके (अर्थात्‌ शाखाओं के बीच से देखकर प्रसत्नतापूर्वक) अहो, मेरे नेत्रों को परमानन्द प्राप्त हो गया । यह मेरी अभिलषित (मनचाही) प्रियतमा फूलों के बिछौने से युक्त शिलापट्ट पर लेटी हुई है और दो सखियों द्वारा (उसको) सेवा की जा रही है । अच्छा, इनके विश्वस्त (गोपनीय) वार्तालाप को सुनता हूँ । (देखता हुआ खड़ा रहता है) । (तत्पश्चात्‌ पूर्वोक्त स्थिति में शकुन्तला दोनों सखियों के साथ प्रवेश करती है) दोनों सखियां:-- (पंखे से हवा झूल कर स्नेहपूर्वक) सखी शकुन्तला, क्या कमलिनीपत्र (से बने पंखे) की हवा तुम्हे सुख दे रही है ? शकुन्तला:-- सखियों, क्या (तुम दोनों) मुझे हवा (पंखा) झूल रही हो ? (दोनों सखियाँ चिन्ता का अभिनय कर एक दूसरे की ओर देखने लगती हैं) । राजा:-- शकुन्तला अत्यन्त अस्वस्थ शरीर वाली दिखायी दे रही है । (विचारपूर्वक) तो क्या यह लू (आतप) का प्रभाव (दोष) है अथवा जैसा मेरे मन में है । (इच्छापूर्वक देखकर) अथवा (इस विषय) में सन्देह करना व्यर्थ है । प्रिय (शकुन्तला) का, स्तनो पर लगे हुये खस के लेप वाला तथा ढीले कमलनाल के एक कङ्कन वाला पीडित (अस्वस्थ) यह शरीर क्या ही मनोहर (है) (सचमुच) युवतियों पर कामदेव और लू के सञ्चार का सन्ताप भले ही समान (हो), किन्तु लू का सन्ताप ऐसा सोन्दर्यवर्धक (मनोहर) नहीं (होता) ।
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