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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 22
क्व नु खलु सम्प्रति गच्छामि ? अथवा इहैव प्रियापरिभुक्तमुक्ते लतावलये मुहूर्त स्थास्यामि । (सर्वतोऽवलोक्य) तस्याः पुष्पमयी शरीरलुलिता शय्या शिलायामियं क्लान्तो मन्मथलेख एष नलिनीपत्रे नखैरर्पितः । हस्ताद्‌ भ्रष्टमिदं बिसाभरणमित्यासज्यमानेक्षणो निर्गन्तुं सहसा न वेतसगृहाच्छक्रोमि शुन्यादपि ।।
तो इस समय कहां जाऊं ? अथवा यहां ही प्रियतमा (शकुन्तला) के द्वारा उपभुक्त और (अब) परित्यक्त (शकुन्तला से विहीन) लतामण्डप में थोड़ी देर रुकूँगा । (चारो ओर देखकर) शिला पर उस (प्रियतमा शकृन्तला) के शरीर से मर्दित (मसली) गयी यह पुष्प-निर्मित शय्या (है) । कमलिनी के पत्ते पर नाखून के द्वारा लिखित (अङ्कित) यह (उसका) मुरझाया हुआ काम-पत्र (प्रेम-पत्र) (है) । (उसके) हाथ से गिरा हुआ यह कमल-नाल का निर्मित आभूषण (कंगन) है । इस प्रकार (इन वस्तुओं में) संलग्न (आसक्त) दृष्टि वाला मैं (प्रियतमा शकुन्तला से) सूने भी इस बेंत-गृह (बेंत-लतागृह) से एकाएक निकलने (बाहर जाने) में असमर्थ हूँ ।
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