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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 20
शकुन्तला-- मुञ् तावन्माम्‌ । भूयोऽपि सखीजनमनुमानयिष्ये । राजा-- भवतु । मोश्ष्यामि । शकुन्तला- कदा ? अपरिक्षतकोमलस्य यावत्‌ कुसुमस्येव॒ नवस्य षट्पदेन । अधरस्य पिपासता मया ते सदयं सुन्दरि गृह्यते रसोऽस्य ।।
शकुन्तला:-- मुझे अभी छोडिये । फिर मैं (अपनी) सखियों से अनुमति लूंगी । राजा:-- अच्छा, छोड दूंगा । शकुन्तला:-- कब ? हे सुन्दरी, जब भ्रमर (भौंरे) के द्वारा नीवन पुष्प (के रस) की भाँति, प्यासे मेरे द्वारा अक्षत (न चूमे गये) और कोमल तुम्हारे इस अधर का रस दयापूर्वक (धीरे-धीरे) ग्रहण कर लिया (पी लिया) जायेगा (तब छोड़ूंगा) ।
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