शकुन्तला:--
मुझे अभी छोडिये । फिर मैं (अपनी) सखियों से अनुमति लूंगी ।
राजा:--
अच्छा, छोड दूंगा ।
शकुन्तला:--
कब ?
हे सुन्दरी, जब भ्रमर (भौंरे) के द्वारा नीवन पुष्प (के रस) की भाँति, प्यासे मेरे द्वारा अक्षत (न चूमे गये) और कोमल तुम्हारे इस अधर का रस दयापूर्वक (धीरे-धीरे) ग्रहण कर लिया (पी लिया) जायेगा (तब छोड़ूंगा) ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।