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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 11
प्रियवदा- (विचिन्त्य) हला, मदनलेखोऽस्य क्रियताम्‌ । तं सुमनोगोपितं कृत्वा देवप्रसादस्यापदेशेन तस्य हस्तं प्रापयिष्यामि । अनसूया-- रोचते मे सुकुमारः प्रयोगः । किं वा शकुन्तला भणति ? शकुन्तला-- किं नियोगो वां विकल्प्यते । प्रियवंदा-- तेन ह्यात्मन उपन्यासपूर्वं चिन्तय तावत्‌ किमपि ललितपदबन्धनम्‌। शकुन्तला--हला, चिन्तयाम्यहम्‌ । अवधीरणाभीरुकं पुनर्वेपते मे हदयम्‌ । राजा-- (सहर्षम्‌) अयं स ते तिष्ठति सङ्कमोत्सुको विशङ्कसे भीरु यतोऽवधीरणाम्‌ । लभेत वा प्रार्थयिता नवा श्रिय श्रिया दुरापः कथमीप्सितो भवेत्‌ ।।
प्रियवंदा:-- (सोचकर) सखी, इस (राजा दुष्यन्त) के लिये (शकुन्तला के द्वारा) मदनलेख (प्रेम-पत्र) लिखवाओ । उस (प्रेम-पत्र) को फूलों मे छिपाकर देवता के प्रसाद्‌ के बहाने से मैं उस (राजा दुष्यन्त) के हाथ में पहंचा दूंगी । अनसूया:-- यह सुकुमार (सुगम) प्रयोग (उपाय) मुझे पसन्द है । किन्तु शकुन्तला क्या कहती है (अर्थात्‌ उसका क्या विचार है) ? शकुन्तला:-- क्या तुम दोनो की आज्ञा टाली जा सकती है (अर्थात्‌ नहीं टाली जा सकती है) | प्रियवंदा:-- तो अपना उल्लेख करते हुए कोई ललित-पदों वाली रचना (बन्धन) सोचो । शकुन्तला:-- सखी, मैं सोचती हूँ । (किन्तु) तिरस्कार से भीत मेरा हृदय कांप रहा है । राजा:-- (प्रसन्रतापूर्वक) हे भयशीले (भयालु) जिससे तुम तिरस्कार (अनादर) की अशंका करती हो, वही यह (दुष्यन्त) तुम्हारे मिलन के लिये उत्कण्ठित खड़ा है । प्रार्थना करने वाला (लक्ष्मी को चाहने वाला) व्यक्ति लक्ष्मी को प्राप्त करे अथवा न (करे), किन्तु लक्ष्मी के द्वारा चाहा गया व्यक्ति (लक्ष्मी के लिये) भला कैसे दुर्लभ हो सकता है ?
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