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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 16
अनसुया- इतः शिलातलैकदेशमलङ्करोतु वयस्यः । (राजोपविशति । शकुन्तला सलज्जा तिष्ठति) प्रियंवदा- द्वयोरपि युवयोरन्योन्यानुरागः प्रत्यक्षः । सखीस्नेहः पुनर्मा पुनरुक्तवादिनीं करोति । राजा-- भद्रे, नैतत्‌ परिहार्यम्‌ । विवक्षितं ह्यनुक्तमनुतापं जनयति । प्रियंवदा--आपन्नस्य विषयनिवासिनो जनस्यार्तिहरेण राज्ञा भवितव्यसित्येष वो धर्मः । राजा-- नास्मात्‌ परम्‌ । प्रियंवदा- तेन हीयमावयोः प्रियसखी त्वामुदिश्येदमवस्थान्तरं भगवता मदनेनारोपिता । तदुर्हस्यभ्युपपत्त्या जीवितमस्या अवलम्बितुम्‌ । राजा-- भद्रे, साधारणोऽयं प्रणयः । सर्वथाऽनुगृहीतोऽस्मि । शकुन्तला (प्रियंवदामवलोक्य) हला, किमन्तःपुरविरहपरयुतुकस्य राजर्षेरुपरोधेन । राजा-- इदमनन्यपरायणमन्यथा हदयसन्निहिते हदयं मम । यदि समर्थयसे मदिरेक्षणे मदनबाणहतोऽस्मि हतः पुनः ।। अनसुया-- वयस्य, बहुवल्लभा राजानः श्रूयन्ते । यथा नौ प्रियसखी बन्धुजनशोचनीया न भक्ति तथा निर्वाहय । राजा-- भद्रे, कि बहुना । परिग्रहबहुत्वेऽपि दे प्रतिष्ठे कुलस्य मे। समुद्ररसना चोर्वी सखी च युवयोरियम्‌ ।।
अनसूया:-- प्रियमित्र (आप) इधर शिला-तल के एक भाग को सुशोभित करें (अर्थात्‌ शिला-तल पर एक ओर आप बैठें) । (राजा बैठता है । शकुन्तला लज्जापूर्वक बैठी रहती है) । प्रियंवदा:-- आप दोनों का परस्पर अनुराग (प्रेम) प्रत्यक्ष (प्रकट) ही है । किन्तु सखी के प्रति मेरा स्नेह मुझे प्रकट बात को फिर कहने के लिये प्रेरित कर रहा है । राजा:-- भद्रे, इसे रोकना नहीं चाहिये । (अर्थात्‌ जो कहना है, उसे अवश्य कहिये) । क्योकि (विवक्षित कहने के लिये इच्छित) बात न कही जाने पर पश्चात्ताप उत्पन्न करती है । प्रियंवदा:-- राजा को (अपने) राज्य में निवास करने वाले आपत्ति-ग्रस्त व्यक्ति के कष्टों को दूर करने वाला होना चाहिये । यह आप का कर्तव्य है । राजा:-- इससे बड़ा ओर कोई (राजा का कर्तव्य) नहीं है । प्रियंवदा:-- तो हम लोगो की यह प्रियसखी (शकुन्तला) आप को उदेश्य कर (आप के कारण) कामदेव के द्वारा इस अवस्था को प्राप्त करायी (पहुंचायी) गयी है । तो आप अनुग्रह पूर्वक इस (शकुन्तला) के जीवन की रक्षा करने के योग्य हैँ (अर्थात्‌ आप अनुग्रह पूर्वक इसके जीवन की रक्षा करें) । राजा:-- भद्रे, यह याचना (प्रार्थना) (दोनों ओर से) समान (साधारण) है अर्थात्‌ दोनों को एक दूसरे की रक्षा करनी चाहिये । मैं सर्वथा (आप लोगों का) अनुगृहीत हूँ । शकुन्तला:-- (प्रियंवदा को देखकर) सखी, अन्तःपुर की स्त्रियों के वियोग से उत्कण्ठित राजर्षि को रोकने से क्या (लाभ है) (अर्थात्‌ उन्हे क्यों रोकती हो) ? राजा:-- हे मादक (मतवाले) नेत्रों वाली (मेरे) हदय में विराजमान (प्रिय शकुन्तले), केवल तुम्हारे में ही आसक्त इस मेरे हदय को यदि तुम अन्यथा (अर्थात्‌ दूसरे में आसक्त) समझती हो (तो) कामदेव के बाणों से हत (मारा हआ) मैं फिर (तुम्हारे द्वारा) मार दिया गया (हूँ) । अनसूया:-- मित्र, राजा लोग बहुत पत्नियों वाले सुने जाते हँ (अर्थात्‌ राजाओं की बहुत सी पत्नियां होती हैं) । इसलिये वैसा व्यवहार कीजियेगा, जिससे हम लोगों की प्रियसखी (शकुन्तला) बन्धुजनों (सगे सम्बन्धियों) के लिये शोचनीय (चिन्ता का कारण) न हो । राजा:-- भद्रे, अधिक कहने से क्या (लाभ) ? अनुवाद्‌:-- अनेक पत्नियों के होने पर भी मेरे कुल (वंश) की दो प्रतिष्ठा (के आधार) हैं - सागररूपी मेखला वाली (समुद्र से घिरी हई) पृथ्वी और आप दोनों की यह सखी (शकुन्तला) ।
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