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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 18
शकुन्तला- न माननीयेष्वात्मानमपराधयिष्ये । राजा- सुन्दरि, अनिर्वाणो दिवसः । इयं च ते शरीरावस्था । उत्सृज्य कुसुमशयनं नलिनीदलकल्पितस्तनावरणम्‌ । कथमातपे गमिष्यसि परिबाधापेलवैरङ्खैः ।।
शकुन्तला:-- मैं आदरणीय लोगों के प्रति अपने को अपराधिनी नहीं बनाऊंगी । (उठकर जाना चाहती है) । राजा:-- सुन्दरी, दिन (अभी) ढला नहीं (अनिर्वाण) है । और तुम्हारे शरीर की यह दशा है । कमलिनी के पत्तों से बनाये गये स्तनों के आवरण वाली पुष्प-शय्या को छोड़कर पीड़ा के कारण कोमल अंगों से धूप में कैसे जाओगी ? (बलपूर्वक इसको लौटाता है) ।
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