शकुन्तला:--
सखी, मेरे द्वारा पद्य (गीत) की वस्तु (भाव) सोच ली गयी है । किन्तु लिखने का साधन (यहाँ) विद्यमान नहीं है ।
प्रियंवदा:--
तोते के उद्रभाग की भाँति सुकोमल इस कमलिनी के पत्ते पर नखों के द्वारा वर्णों (अक्षरों) को अंकित कर दो ।
शकुन्तला:--
(पूर्वोक्त के अनुसार लिखने का अभिनय कर) सखियों, अब सुनो, (यह पद्य) उचित अर्थ वाला है, अथवा नहीं ।
दोनों:--
हम दोनों (सुनने के लिये) सावधान हैं ।
शकुन्तला:--
(पढ़ती है) हे निर्दय, तुम्हारे हृदय को मैं नहीं जानती हूं, (किन्तु) तुम्हारे प्रति उत्पन्न अभिलाषा से युक्त मेरे अंगों को कामदेव दिन-रात अत्यधिक तपा रहा है (पीड़ित कर रहा है) ।
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