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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 13
शकुन्तला--हला, चिन्तितं मया गीतवस्तु । असन्निहितानि पुनर्लेखनसाधनानि । प्रियंवदा- एतस्मिन्‌ शुकोदरसुकुमारे नलिनीपत्रे नखैर्निक्षिप्तवर्ण कुरु । शकुन्तला (यथोक्तं रूपयित्वा) हला, श्ृणुतमिदानीं सङ्गतार्थं न वेति । उभे--अवहिते स्वः । शकुन्तला-(वाचयति) तव न जाने हदयं मम पुनः कामो दिवाऽपि रात्रावपि । तिर्घण तपति बलीयस्त्वयि वृत्तमनोरथाया अङ्गानि ।।
शकुन्तला:-- सखी, मेरे द्वारा पद्य (गीत) की वस्तु (भाव) सोच ली गयी है । किन्तु लिखने का साधन (यहाँ) विद्यमान नहीं है । प्रियंवदा:-- तोते के उद्रभाग की भाँति सुकोमल इस कमलिनी के पत्ते पर नखों के द्वारा वर्णों (अक्षरों) को अंकित कर दो । शकुन्तला:-- (पूर्वोक्त के अनुसार लिखने का अभिनय कर) सखियों, अब सुनो, (यह पद्य) उचित अर्थ वाला है, अथवा नहीं । दोनों:-- हम दोनों (सुनने के लिये) सावधान हैं । शकुन्तला:-- (पढ़ती है) हे निर्दय, तुम्हारे हृदय को मैं नहीं जानती हूं, (किन्तु) तुम्हारे प्रति उत्पन्न अभिलाषा से युक्त मेरे अंगों को कामदेव दिन-रात अत्यधिक तपा रहा है (पीड़ित कर रहा है) ।
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