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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 23
(आकाशे) राजन्‌ , सायन्तने सवनकर्मणि सम्प्रवृत्ते वेदि हुताशनवतीं परितः प्रयस्ताः । छायाश्चरन्ति बहुधा भयमादधानाः । सन्ध्यापयोदकपिशाः - पिशिताशनानाम्‌ ।। राजा-अयमहमागच्छामि । (इति निष्क्रान्तः) । ॥ इति तृतीयोऽङ्कः ॥
(आकाश में) हे राजन्‌ , सायंकालीन यज्ञ-कर्म के प्रारम्भ होने पर अग्नि से युक्त यज्ञ-वेदी के चारों ओर व्याप्त (फैली हुई), सायंकालिक बादलों के समान लाल-काली और भय को उत्पन्न करने वाली, कच्चे मांस का आहार करने वाले राक्षसों की छाया अनेक प्रकार से (विविध रूपों में) विचरण कर रही है । राजा:-- यह मैं (अभी) आता हूँ । (निकल जाता है) । ॥ तृतीय अङ्क समाप्त ॥
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