(आकाश में) हे राजन् ,
सायंकालीन यज्ञ-कर्म के प्रारम्भ होने पर अग्नि से युक्त यज्ञ-वेदी के चारों ओर व्याप्त (फैली हुई), सायंकालिक बादलों के समान लाल-काली और भय को उत्पन्न करने वाली, कच्चे मांस का आहार करने वाले राक्षसों की छाया अनेक प्रकार से (विविध रूपों में) विचरण कर रही है ।
राजा:--
यह मैं (अभी) आता हूँ । (निकल जाता है) ।
॥ तृतीय अङ्क समाप्त ॥
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