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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 4
(सखेदं परिम्य) क्व न खलु संस्थिते कर्मणि सदस्यैरनुज्ञातः खिन्नमात्मानं विनोदयामि । (निःशस्य) किं नु खलु मे प्रियादर्शनादृते शरणमन्यत्‌ । (सूर्यमवलोक्य) इमामुग्रातपवेलां प्रायेण लतावलयवत्सु मालिनीतीरेषु ससखीजना शकुन्तला गमयति । तत्रैव तावद्‌ गच्छामि । (परिक्रम्य संस्पर्श रूपयित्वा) अहो, प्रवातसुभगोऽ यमुदेशः । शक्यमरविन्दसुरभिः कणवाही मालिनीतरङ्गाणाम्‌ । अङ्खैरनङ्तप्तैरविरलमालिङ्खितु पवनः ।।
(खेद के साथ घुमकर) यज्ञ-कार्य के समाप्त (सम्पन्न) हो जाने पर (यज्ञ-सभा के) सदस्यों (ऋषियों) द्वारा आज्ञा प्राप्त कर मैं अपने खिन्न मन को कहाँ बहलाऊं । (लम्बी सांस लेकर) प्रिय (शकुन्तला) के दर्शन के अतिरिक्त मेरे लिये दूसरा क्या सहारा है । तब तक मैं उसी को ढूंढता हूं । (सूर्य को देखकर) इस तेज धूप वाली वेला (समय) को शकुन्तला प्रायः अपनी सखियों के साथ लता-कुञ्ञो वाले मालिनी नदी के तट पर बिताती होगी । तो वहां ही जाता (चलता) हूं । (चारों ओर घूमकर और स्पर्शं का अभिनय कर) ओह, यह स्थान सुखद वायु (प्रवात) के कारण अत्यन्त सुहावना है । कमलों की सुगन्ध से युक्त और मालिनी (नदी) की तरंग (लहर) के (जल के) कणों को वहन (धारण) करने वाली वायु काम-सन्तप्त अंगों से निरन्तर आलिंगन करने के योग्य है ।
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