(इसका मुंह उठाना चाहता है । शकुन्तला अभिनयपूर्वक रोकती है)
(नेपथ्य में) हे चकवी (चक्रवाक-वधू), अपने साथी (चकवे) को विदा करो । रात आ गयी (हो गयी) है ।
शकुन्तला:--
(घबराहट के साथ) हे पुरुवंशी राजन् , निःसन्देह मेरे शरीर का समाचार जानने के लिये आर्य गौतमी इधर ही आ रही हैं । इसलिये शाखाओं (डालियो) की ओट (आड़) मे छिप जाइये ।
राजा:--
(जैसा आप कहती हैं) । वैसा (ही करता हूँ) । (अपने को छिपाकर खड़ा हो जाता है) ।
(तत्पश्चात् पात्र लिये हुये गोतमी और दोनों सखियाँ प्रवेशा करती हैं)
दोनों सखियां:--
आर्या गोतमी, इधर से, इधर से (आइये) ।
गौतमी:--
(शकुन्तला के समीप जाकर) पुत्री, तुम्हारे अंगों का सन्ताप कुछ कम हुआ ?
शकुन्तला:--
आर्या मुझे कुछ अन्तर (लाभ) है ।
गौतमी:--
इस कुश-युक्त जल से तुम्हारा शरीर पूर्ण स्वस्थ (सन्तापरहित) हो जायेगा । (शकुन्तला के सिर पर जल छिड़ककर) बेटी, दिन ढल गया है । आओ, कुटी पर ही चलें । (सभी चल देती हैं) ।
शकुन्तला:--
(अपने मन में) हे हदय, पहले तो (दुष्यन्त रूप) मनोरथ के अनायास प्राप्त होने पर (तुमने अपना) संकोच (कातरभावः) नहीं छोड़ा । अब पश्चात्ताप के साथ वियुक्त होते हुये (बिछड़ते हुये) (तुमको) क्यों सन्ताप (हो रहा है) ? कुछ पग चलने के बाद रुक कर (प्रकट रूप में) हे सन्ताप को दूर करने वाले लताकुञ्च, तुमको फिर सेवन (उपभोग) के लिये निमन्त्रित कर रही हूँ । (शकुन्तला दुखपूर्वक दूसरों के साथ चली जाती है) ।
राजा:--
(पहले वाले स्थान पर जाकर, लम्बी सांस लेकर) अहो, अभीष्ट (अभिलषित) वस्तुओं की प्राप्ति विघ्नो (बाधाओं) से युक्त होती है । क्योंकि मेरे द्वारा सुन्दर नेत्रों वाली (शकुन्तला) का बार-बार उंगली (तर्जनी) से ठके हुए अधरोष्ठ वाला, (चुम्बनादि के) निषेध (मना करने) के अक्षरों के अस्पष्ट उच्चारण करने के कारण मनोहर और (उसके द्वारा) कन्धों की ओर मोड़ा गया मुख (मेरे द्वारा) किसी प्रकार (अर्थात् बड़ी कठिनाई से) ऊपर उठाया गया किन्तु चूमा नहीं जा सका (अर्थात् मैंने उसके मुख को ऊपर तो उठा लिया, किन्तु चुम्बन नहीं कर पाया ।
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