मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 21
(इति मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति । शकुन्तला परिहरति नाव्येन) (नेपथ्ये) चक्रवाकवधुके, आमन्रयस्व सहचरम्‌ । उपस्थिता रजनी । शकुन्तला-- (ससम्भ्रमम्‌) पौरव, असंशयं मम शरीरवृत्तान्तोपलम्भायार्यां गौतमीत एवागच्छति । तद्‌ विटपान्तरितो भव । राजा-तथा । (इत्यात्मानमावृत्य तिष्ठति) । (ततः प्रविशति पात्रहस्ता गौमती सख्यौ च) सख्यौ--इत इत आर्या गौमती । (इदो इदो अज्जा गोदमी ।) गौतमी--(शकुन्तलामुपेत्य) जाते, अपि लघुसन्तापानि तेऽङ्घानि । शकुन्तला-- आर्ये, अस्ति मे विशेषः । गौतमी--अनेन दर्भोदकेन मिराबाधमेव ते शरीरं भविष्यति । (शिरसि शकुन्तलामभ्युक्ष्य) वत्से, परिणतो दिवसः । एहि, उटजमेव गच्छामः । शकुन्तला-(आत्मगतम्‌) हृदय, प्रथममेव सुखोपनते मनोरथ कातरभावं नं मुञ्चसि । सानुशयविघटितस्य कथं ते साग्तं सन्तापः । (पदान्तरे स्थित्वा । प्रकाशम्‌) लतावलय सन्तापहारक आमन्रये त्वां भूयोऽपि परिभोगाय । राजा- (पूर्वस्थानमुपेत्य, सनिःश्ासम्‌) अहो, विघ्नवत्यः ग्रार्थतार्थसिद्धयः । मया हि-- मुहरङ्गलिसंवृताधरोष्ठं प्रतिषेधाक्षरविक्लवाभिरामम्‌ । मुखमंसविवर्ति पक्ष्मलाक्ष्याः कथमप्युन्नमितं न चुम्बितं तु ।।
(इसका मुंह उठाना चाहता है । शकुन्तला अभिनयपूर्वक रोकती है) (नेपथ्य में) हे चकवी (चक्रवाक-वधू), अपने साथी (चकवे) को विदा करो । रात आ गयी (हो गयी) है । शकुन्तला:-- (घबराहट के साथ) हे पुरुवंशी राजन्‌ , निःसन्देह मेरे शरीर का समाचार जानने के लिये आर्य गौतमी इधर ही आ रही हैं । इसलिये शाखाओं (डालियो) की ओट (आड़) मे छिप जाइये । राजा:-- (जैसा आप कहती हैं) । वैसा (ही करता हूँ) । (अपने को छिपाकर खड़ा हो जाता है) । (तत्पश्चात्‌ पात्र लिये हुये गोतमी और दोनों सखियाँ प्रवेशा करती हैं) दोनों सखियां:-- आर्या गोतमी, इधर से, इधर से (आइये) । गौतमी:-- (शकुन्तला के समीप जाकर) पुत्री, तुम्हारे अंगों का सन्ताप कुछ कम हुआ ? शकुन्तला:-- आर्या मुझे कुछ अन्तर (लाभ) है । गौतमी:-- इस कुश-युक्त जल से तुम्हारा शरीर पूर्ण स्वस्थ (सन्तापरहित) हो जायेगा । (शकुन्तला के सिर पर जल छिड़ककर) बेटी, दिन ढल गया है । आओ, कुटी पर ही चलें । (सभी चल देती हैं) । शकुन्तला:-- (अपने मन में) हे हदय, पहले तो (दुष्यन्त रूप) मनोरथ के अनायास प्राप्त होने पर (तुमने अपना) संकोच (कातरभावः) नहीं छोड़ा । अब पश्चात्ताप के साथ वियुक्त होते हुये (बिछड़ते हुये) (तुमको) क्यों सन्ताप (हो रहा है) ? कुछ पग चलने के बाद रुक कर (प्रकट रूप में) हे सन्ताप को दूर करने वाले लताकुञ्च, तुमको फिर सेवन (उपभोग) के लिये निमन्त्रित कर रही हूँ । (शकुन्तला दुखपूर्वक दूसरों के साथ चली जाती है) । राजा:-- (पहले वाले स्थान पर जाकर, लम्बी सांस लेकर) अहो, अभीष्ट (अभिलषित) वस्तुओं की प्राप्ति विघ्नो (बाधाओं) से युक्त होती है । क्योंकि मेरे द्वारा सुन्दर नेत्रों वाली (शकुन्तला) का बार-बार उंगली (तर्जनी) से ठके हुए अधरोष्ठ वाला, (चुम्बनादि के) निषेध (मना करने) के अक्षरों के अस्पष्ट उच्चारण करने के कारण मनोहर और (उसके द्वारा) कन्धों की ओर मोड़ा गया मुख (मेरे द्वारा) किसी प्रकार (अर्थात्‌ बड़ी कठिनाई से) ऊपर उठाया गया किन्तु चूमा नहीं जा सका (अर्थात्‌ मैंने उसके मुख को ऊपर तो उठा लिया, किन्तु चुम्बन नहीं कर पाया ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें