तब तक (इस) वेदी पर बिछाने के लिये इन कुशों को ऋत्विज (पुरोहितं) को देता हूँ (घूमकर और आकाश की ओर देखकर) प्रियंवदा, उशीर (खस) का यह लेप और कमल-नाल सहित कमल के ये पतते किसके लिये ले जाये जा रहे है ? (सुनने का अभिनय कर) क्या कह रही हो ? आतप (लू) लगने से शकुन्तला अत्यधिक अस्वस्थ हो गयी है, उसके शरीर को शान्ति प्रदान करने (निर्वाप) के लिये (यह सामग्री ले जा रही हूँ) । तो यत्नपूर्वक (सावधानी से) उपचार करना । वह भगवान् कुलपति कण्व की प्राण है । तब तक मैं भी उसके लिये यज्ञीय (वैतानिक) शान्ति-जल गोतमी के हाथ भिजवा रहा हूँ । (निकल जाता है) ।
|| विष्कम्भक समाप्त ॥
राजा:--
(लम्बी सांस लेकर) मैं तपस्या के सामर्थ्य (शक्ति) को जानता हूँ । वह कन्या (शकुन्तला) पराधीन (है) यह (भी) मुझको ज्ञात है । तो भी (अपने) हदय (मन) को उससे लोटाने में (हटाने) में समर्थ नहीं हूँ ।
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