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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 3 • श्लोक 2
यावदिमान्‌ वेदिसंस्तरणार्थं दभनत्विगभ्य उपहरामि (परिक्रम्यावलोक्य च आकाशे) प्रियवदे, कस्येदमुशीरानुलेपनं मृणालवन्ति च नलिनीपत्राणि नीयन्ते ? (श्रुतिमभिनीय) कि व्रवीषि । आतपलङ्खनाद्‌ बलवदस्वस्था शकुन्तला, तस्याः शरीरनिरवपिणायेति । तर्हिं यत्नादुपयर्चताम्‌ । सा खलु भगवतः कण्वस्य कुलपतेरुच्छ्वसितम्‌ । अहमपि तावद्‌ वैतानिक शान्त्युदकमस्यै गौतमीहस्ते विसर्जयिष्यामि । (इति निष्क्रान्तः) । ।। इति विष्कम्भकः ।। राजा-(निःश्चस्य)-- जाने तपसो वीर्यं सा बाला परवतीति मे विदितम्‌ । अलमस्मि ततो हदयं तथापि नेदं निवर्तयितुम्‌ ।।
तब तक (इस) वेदी पर बिछाने के लिये इन कुशों को ऋत्विज (पुरोहितं) को देता हूँ (घूमकर और आकाश की ओर देखकर) प्रियंवदा, उशीर (खस) का यह लेप और कमल-नाल सहित कमल के ये पतते किसके लिये ले जाये जा रहे है ? (सुनने का अभिनय कर) क्या कह रही हो ? आतप (लू) लगने से शकुन्तला अत्यधिक अस्वस्थ हो गयी है, उसके शरीर को शान्ति प्रदान करने (निर्वाप) के लिये (यह सामग्री ले जा रही हूँ) । तो यत्नपूर्वक (सावधानी से) उपचार करना । वह भगवान्‌ कुलपति कण्व की प्राण है । तब तक मैं भी उसके लिये यज्ञीय (वैतानिक) शान्ति-जल गोतमी के हाथ भिजवा रहा हूँ । (निकल जाता है) । || विष्कम्भक समाप्त ॥ राजा:-- (लम्बी सांस लेकर) मैं तपस्या के सामर्थ्य (शक्ति) को जानता हूँ । वह कन्या (शकुन्तला) पराधीन (है) यह (भी) मुझको ज्ञात है । तो भी (अपने) हदय (मन) को उससे लोटाने में (हटाने) में समर्थ नहीं हूँ ।
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