मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 6 — छेद्यकाधिकार:

सूर्य सिद्धांत
24 श्लोक • केवल अनुवाद
छेद्यक के बिना सूर्यचन्द्र के ग्रहण के भेद अर्थात्‌ स्पर्श मोक्ष सम्मीलन ग्रास आदि के भेद स्पष्ट ज्ञात नहीं होते इसलिये उस उत्तम छेद्यक ज्ञान को कह रहा हूँ।
संशोधित समतल भूमि में इष्टस्थान में बिन्दु निश्चित कर उस बिन्दु से ७ के वर्ग अर्थात्‌ ४९ अंगुल के व्यासार्ध से निर्मित प्रथम वृत्त वलनवृत्त होता है।
ग्राह्य और ग्राहकबिम्ब के योगार्ध से अर्थात्‌ मानैक्यखण्ड से समाससंज्ञक दूसरा वृत्त तथा ग्राह्मबिम्ब के व्यासार्ध से तीसरा ग्राह्म वृत्त का निर्माण करें।
इन वृत्तों में त्रिप्रश्नांधिकारोक्त प्रकार से पूर्वापरा और याम्योत्तरा दिशा का साधन करना चाहिए। चन्द्रमा का पूर्व दिशा में स्पर्श और पश्चिम दिशा में मोक्ष, तथा सूर्य का पश्चिमदिशा में स्पर्श एवं पूर्वदिशा में मोक्ष होता है।
चन्द्र के स्पार्शिक वलन का पूर्वचिह्न से पूर्वापर सूत्र से अर्धज्या की तरह यथागत दिशा में न्यास होता है अर्थात्‌ दक्षिण हो तो दक्षिणाभिमुख और उत्तर हो तो उत्तरभिमुख न्यास करना चाहिए। (अर्थात्‌ एक रेखा खींचना चाहिए।) मौक्षिकवलन का विपरीत अर्थात्‌ पश्चिम चिह्न से पूर्वापर सूत्र से अर्धज्या की तरह दक्षिण हो तो उत्तराभिमुख और उत्तर हो तो दक्षिणाभिमुख दान करना चाहिए। सूर्य का स्पाशिकवलन पश्चिम चिह्त से पूर्वापर सूत्र से दक्षिण हो तो उत्तराभिमुख और उत्तर हो तो दक्षिणाभिमुख देना चाहिए और मोक्षकालिक वलन को पूर्वचिह्न से दक्षिण हो तो दक्षिणाभिमुख और उत्तर हो तो उत्तराभिमुख दान करना चाहिए।
वलनाश्रित वृत्त में स्थित स्पार्शिक और मौक्षिक वलनाग्र चिहनों से वृत्त के केन्द्रपर्यन्त किये हुए सूत्र मानैक्यार्ध (समास) वृत्त की परिधि को जहां स्पर्श करें वहां से अर्धज्या के तुल्य क्रमानुसार स्पर्श और मोक्षकाल के शरों का वक्ष्यमाण क्रम से दान करना चाहिए।
मानैक्यार्धवृत्तस्थ शराग्र चिहनों से वृत्त के केन्द्रपर्यनत की गई रेखा और ग्राह्मगवृत्त की परिधि के सम्पात चिहनों पर स्पर्श और मोक्ष होता है। अर्थात्‌ स्पाशिकिशराग्र सूत्र एवं ग्राह्मबिम्ब के सम्पात बिन्दु पर स्पर्श, तथा मोक्षकालिक शणग्रसूत्र और ग्राह्मबिम्ब के सम्पात बिन्दु पर मोक्ष होता है।
सूर्य ग्रहण में शर का दान दिशा के क्रम से (अर्थात्‌ दक्षिण शर हो तो दक्षिण दिशा में उत्तर शर हो तो उत्तर दिशा में) करना चाहिए। चन्द्रग्रहण में इससे विपरीत शरदान होता है अर्थात्‌ दक्षिण शर हो तो उत्तर दिशा में, उत्तरशर हो तो दक्षिण दिशा में शर का दान करना चाहिए । चन्द्रग्रहण में मध्य ग्रहण कालिक वलन एवं शर दोनों की दक्षिण दिशा हो तो उत्तर चिहन से, उत्तर दिशा हो तो दक्षिण चिहन से, पूर्वाभिमुख मध्यग्रहण कालिक स्पष्टवलन का दान करना चाहिए।
यदि दक्षिणवलन और उत्तरशर हो तो दक्षिण चिह्न से, उत्तरवकन और दक्षिणशर हो तो उत्तर चिह्न से, पश्चिमाभिमुख मध्यग्रहणकालिक स्पष्टवलन का दान करना चाहिए। सूर्यग्रहण में वऊन और शर की दक्षिणदिशा हो तो दक्षिण चिहन से और उत्तरदिशा हो तो उत्तर चिह्न से पश्चिमाभिमुख वलन का दान करना चाहिए। यदि दक्षिण वलन और उत्तर शर हो तो उत्तर चिह्न से, तथा उत्तर वलन और दक्षिण शर हो तो दक्षिण चिहन से पूर्वाभिमुख वलन का दान करना चाहिए।
वलनश्रितवृत्त में स्थित मध्यवलनाग्र चिह्न से वृत्त के केन्द्रपर्यनत की गई रेखा में केन्द्र से मध्यविक्षेप का दान कर शगराग्र को केन्द्र मान कर
छादकबिम्ब के मानार्ध तुल्य व्यासार्ध से निर्मित वृत्त ग्राह्मवेत्त जितना आवृत होगा उतना भाग छादकबिम्ब से आच्छादित होगा।
समान भूमि में अथवा काष्ठादि से निर्मित पड़िका में छेद्यक बनाते समय गणक को पूर्वापरकपाल में दिशाओं का व्यतिक्रम करना चाहिये। अर्थात्‌ पूर्वकपाल में जिस प्रकार सव्यक्रम से पूर्वादि दिशाओं का अड्डून किया है उससे विपरीत क्रम से पशिमकपाल में करें।
चन्द्र विम्ब के स्वच्छ होने से (चकाचौंध रहित होने से) १ २वाँ भाग भी ग्रसित होने पर चन्द्र ग्रहण स्पष्ट दिखलाई देता है किन्तु सूर्यविम्ब के तीक्ष्ण प्रकाश के कारण ३ कला का भी सूर्यग्रहण दृष्टिगत नहीं होता।
स्पर्श, मध्य और मोक्षकालिक शरगराग्रों पर क्रम से स्पर्श, मध्य और मोक्ष संज्ञक तीन बिन्दु कल्पना कर स्पर्श और मध्य तथा मध्य और मोक्ष संज्ञक बिन्दुओं से
दो मत्स्य (चाप) बनाकर उनकी मुखपुच्छगत (दोनों सम्पात बिन्दुगत) रेखाओं को अपने मार्ग में बढ़ाने से जहाँ उनका योग हो
उस योगबिन्दु को केन्द्र मानकर स्पर्श, मध्य और मोक्षसंज्ञक बिन्दुओं को स्पर्श करते हुए व्यासार्धरूप सूत्र से जो चाप बनेगा वह चापात्मक ग्राहकमार्ग होगा। उस मार्ग से ग्राहक बिम्ब ग्राह्मबिम्ब के आच्छादन के छिये गमन करेगा।
मानैक्यखण्ड में इष्टग्रास घटाकर शेष अंगुल तुल्य शलाका को मध्यबिन्दु से स्पर्श मोक्ष शरणग्र की दिशा में अंकित करें
अर्थात्‌ मध्यग्रास से पूर्व इष्टग्रास होने पर स्पर्शशराग्राभिमुखी और मध्यग्रास से पश्चात्‌ इष्टग्रास होने पर मोक्षशराग्राभिमुखी शलाका अंकित करूनी चाहिये।
शलाका ग्राहकमार्ग को जहां स्पर्श करे उस बिन्दु को केन्द्र मानकर ग्राहक बिम्ब व्यासार्द्ध से वृत्त बनायें वह वृत्त ग्राह्मवृत्त के जितने भाग को काटेगा उतना भाग ग्राहक बिम्ब से आच्छादित होगा। अर्थात्‌ उतना ग्रास इष्टकाल में होगा।
ग्राह्म विम्ब के केन्द्र से मानान्तर खण्ड के तुल्य एक शलाका ग्रास की दिशा की ओर रखने से ग्राहक मार्ग को जिस स्थान पर शलाका स्पर्श करती है उस स्थान पर सम्मीलन का केन्द्र होता है।
इसी केन्द्र से ग्राहक (छादक) विम्ब व्यासार्ध से खींचा गया वृत्त ग्राह्म (छाद्य) विम्ब को जहाँ स्पर्श करेगा वहीं सम्मीलन का आरम्भ स्थान होगा।
इसी प्रकार मध्यबिन्दु से मोक्षशराग्र की दिशा में मानान्तरार्ध तुल्य शलाका रखकर, शलाका और ग्राहकमार्ग के योगस्थान से ग्राहक बिम्ब व्यासार्ध से ग्राहकवृत्त बनायें। ग्राहकवृत्त और ग्राह्मवृत्त का जिस दिशा में जिस स्थान पर योग होगा उस स्थान से उस दिशा में उन्‍्मीलन आरम्भ होगा।
चन्द्रग्रहण में चन्द्रबिम्ब का आधे से अल्प ग्रास होने पर ग्रस्तभाग धूम्रवर्ण का, अर्धाधिक ग्रस्त होने पर ग्रस्तभाग कृष्णवर्ण का, मोक्षाभिमुख अर्थात्‌ पादोनबिम्ब से अधिक ग्रास होने पर कृष्णताम्रवर्ण तथा सम्पूर्ण ग्रहण होने पर कपिलवर्ण (हल्का पीत वर्ण) होता है। सूर्यग्रहण में सूर्य का ग्रास सदैव कृष्णवर्ण ही होता है।
छेद्यक प्रकरण देवताओं का गोपनीय विषय है। इसे जिस-किसी को नहीं देना चाहिए एक वर्ष पर्यन्त अपने पास रखकर भलीभाँति परीक्षा किये हुए (सदाचारी) शिष्य को यह विद्या देनी चाहिए।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें