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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 6 • श्लोक 15
लिखेन्मत्स्यौ तयोर्म॑ध्यान्मुखपुच्छविनि: सृतम्‌ । प्रसार्यसूत्रद्वितयं तयोरयत्र युतिभ्भवेत्‌ ॥
दो मत्स्य (चाप) बनाकर उनकी मुखपुच्छगत (दोनों सम्पात बिन्दुगत) रेखाओं को अपने मार्ग में बढ़ाने से जहाँ उनका योग हो
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