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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 6 • श्लोक 5
वलनदानविधि: यथादिश प्राग्रहणं वलनं हिमदीधिते: । मौक्षिकं तु विपर्यस्तं, विपरीतमिदं रवे: ।।
चन्द्र के स्पार्शिक वलन का पूर्वचिह्न से पूर्वापर सूत्र से अर्धज्या की तरह यथागत दिशा में न्यास होता है अर्थात्‌ दक्षिण हो तो दक्षिणाभिमुख और उत्तर हो तो उत्तरभिमुख न्यास करना चाहिए। (अर्थात्‌ एक रेखा खींचना चाहिए।) मौक्षिकवलन का विपरीत अर्थात्‌ पश्चिम चिह्न से पूर्वापर सूत्र से अर्धज्या की तरह दक्षिण हो तो उत्तराभिमुख और उत्तर हो तो दक्षिणाभिमुख दान करना चाहिए। सूर्य का स्पाशिकवलन पश्चिम चिह्त से पूर्वापर सूत्र से दक्षिण हो तो उत्तराभिमुख और उत्तर हो तो दक्षिणाभिमुख देना चाहिए और मोक्षकालिक वलन को पूर्वचिह्न से दक्षिण हो तो दक्षिणाभिमुख और उत्तर हो तो उत्तराभिमुख दान करना चाहिए।
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