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अध्याय 5 — पञ्चम अध्याय

शिवभारतम्
60 श्लोक • केवल अनुवाद
जैसे धृतराष्ट्र के पुत्र शांतवृत्ति धर्मराज से ईर्ष्या करते थे, वैसे ही विठ्ठलजी राजा के खेलकर्ण आदि पुत्र
अपने भाईचारे के कारण शाहजी राजा से कदम-कदम पर अत्यधिक द्वेष करने लगे।
जिन्होंने अपनी अलौकिक बुद्धि से पृथ्वी पर विजय प्राप्त की और आश्रय करने के लिए योग्य निजामशाह के मलिकंबर प्रधान, तथा
उनका वैभव स्वयं को प्राप्त हो ऐसी अभिलाषा करने वाले विट्ठलज़ी के पुत्रों ने उनकी शरण ली। सूर्य के समान तेजस्वी शहाजीराजे उनकी आंखों में चुभने लगे।
अपने कुल में भेदभाव उत्पन्न हो गया है, यह उस संकेतों को जानने वाले बुद्धिमान शाहजी ने पहचान लिया और
मलिकंबर, निजामशाह और अपने विरुद्ध छल कपट करने वाले अपने दुष्ट चचेरे भाइयों का तिरस्कार करके
अत्यंत उत्साही, स्वाभिमानी, चील के समान पराक्रमी, विजयश्री का घर और कंधे पर भाला लिए हुए शाहजी ने,
अपनी सेना और प्रचुर युद्ध सामग्री के साथ जल्दी से अपने देश की ओर प्रस्थान किया।
वहाँ से जाने के बाद अपने नगर में धन-धान्य परिपूर्ण होकर रहते हुए उस शहाजीराजे को निजामशाह का एक भी मंत्री अपने वश में नहीं कर सका।
जिस प्रकार सूर्य के बिना आकाश सुंदर नहीं लगता है, उसी प्रकार शाहजी के चले जाने पर निजाम का राज्य समृद्ध होने के बावजूद भी शोभायमान प्रतीत नहीं हो रहा था।
दोनों के बीच भेद करने के लिए यह संधि योग्य है ऐसा देखकर उस महाबुद्धिमान एवं निजामशाह के प्रतिस्पर्धी आदिलशाह ने
अपने प्रमुखों द्वारा, महाबलशाली, अति उत्साहीत एवं उदारमना उस शहाजीराजे को सहायतार्थ बुलाकर, वह (आदिलशाह) अपने आपको अजेय मानने लगा।
जैसे वायु की सहायता से दावानल वनों को जलाकर वृद्धि को प्राप्त होती है, वैसे ही शहाजीराजे की सहायता मिलने से आदिलशाह दुश्मन सेना को नष्ट करके उत्कर्ष को प्राप्त हो गया।
अपने तेज से सर्वत्र चमकता हुआ सूर्य जिस प्रकार सुंदर ग्रहों से युक्त आकाश पर आक्रमण करता है, उसी प्रकार महाबाहु शाहजी ने अपनी महिमा से उस कुलीन मलिकाम्बर को जीत लिया।
जैसे तेज बहने वाली तूफानी हवा जड़ों से युक्त पेड़ों को उखाड़ देती है, वैसे ही उत्कृष्टता को प्राप्त होने वाले शाहजी ने निजामशाह के बाहुबल के गर्व को नष्ट कर दिया।
तब उस इब्राहिम आदिलशाह ने संतुष्ट होकर अपने शत्रुओं का नाश करने वाले शाहजी राजा को अपना आधा पद दे दिया, ऐसा मुझे लगता है।
समृद्ध लोगों द्वारा सेवित, पर्वत के समान ऊँचा, पराक्रमी और अभिमानी ऐसा वह मुधोजी फलटणकर,
इब्राहिम आदिलशाह के खिलाफ होने से उस पर शाहाजीराजे ने पूरी तरह तैयारी के साथ आक्रमण करके उसको बुरी तरह से पराजित किया।
कर्नाटक और केरल पर विजय प्राप्त करके प्रतापी शाहजी ने इब्राहिम शाह के खजाने में इजाफा करके उसे बहुत संतुष्ट किया।
उसने अन्य शक्तिशाली राजाओं को अपनी नीतियों के माध्यम से अधीन कर लिया और इब्राहिमशाह के राज्य को राम के राज्य के समान बना दिया।
जैसे पार्वती ने शंकर की सेवा की, वैसे ही जाधव कुल में उत्पन्न चंद्रमा जैसी सुंदर मुख वाली एवं सुंदर दांतों वाली उस जीजाबाई ने शाहजी महाराज की सेवा की।
वह अत्यंत विलासिनी एवं प्रसन्नवदना साध्वी रानी अपने पति की हर इच्छा को पूर्ण करती थी।
उनको जीजाबाई से शुभ लक्षणों से युक्त छः बेटे हुए, उनमें से शंभू और शिवाजी दो ही वंशवर्धक हुए।
लेकिन विष्णु का अंश शिवाजी पृथ्वी पर अवतरित होकर वह सभी राजाओं का नेता और दुश्मनों का विनेता कैसे हुआ,
यह मैं बताऊंगा, हे द्विज श्रेष्ठों आप ध्यान से सुनो।
प्राचीन काल में प्रतिदिन की घोर तपस्या से शंकर को प्रसन्न करके, वैदिक शाखों का प्रतिषेध करने में कलिकाल बलवान हो गया।
फिर दुष्टों के लिए हितकारी एवं सज्जनों के लिए अहितकर ऐसे उस पापमय कलिकाल को प्राप्त करके
कपटी, देव-ब्राह्मण विरोधी और विध्वंसकारी राक्षस, म्लेच्छों के रूप में धरती पर अवतरित हुए।
पहले उन्होंने पश्चिम दिशा को, फिर उत्तर, पूर्व एवं अजेय दक्षिण को भी बल से जीत लिया।
अपने धर्म को जानते हुए भी उन लोगों में यज्ञ करने की प्रवृत्ति नहीं थी; तथापि कलियुग के प्रभाव से उनकी संपत्ति में तेजी से वृद्धि हुई।
उन बलशाली म्लेच्छों ने कुछ लोगों को उठाकर राजगद्दी पर बिठा दिया और कुछ लोगों को युद्ध में मार डाला। तब से प्राय: सभी क्षत्रियों का नाश हुआ।
तब म्लेच्छों की पीड़ा से पीड़िता विश्वंभरा देवी अपनी रक्षा के लिए रक्षणकर्ता ब्रह्मदेव के पास गई।
भयानक पीड़ा से तेज हीन हुई उस विश्वंभरा देवी ने, जिनकी वंदना तैंतीस कोटि देवता करते हैं ऐसे उस ब्रह्मदेव को वंदना की।
दुखियारी विश्वभरा देवी हाथ जोड़कर अपने अनेक प्रकार के दुःखों को निवेदित करने के लिए ब्रह्मदेव से बोली।
हे ब्रह्मदेवा तुम ही तीनों लोकों के पिता हो एवं वैदिक धर्म की रक्षा करना तुम्हें प्रिय होते हुए भी, मैं इस दुःख सागर में डूब रहीं हूं, फिर भी तुम मेरी उपेक्षा क्यों कर रहे हो?
हे ब्रह्मदेव! आपके द्वारा विरचित जो ये चराचर जगत हैं, वह म्लेच्छरूपी राक्षासों के कारण हाय! आज डूब रहा है।
जिन दुष्ट राक्षसों का देवों ने पहले संहार किया, वे ही इस कलियुग में म्लेच्छरूप धारण करके मुझे पीड़ा दे रहे हैं।
दुष्ट राक्षसों का नाश करने वाले भगवान श्रीकृष्ण अपने घर चलें गये है एवं भगवान बुद्ध ने मौन धारण कर लिया है।
ऐसे समय में दुष्ट यवन पाप करने लगे और मुझे कोई रक्षक नहीं मिला, तो मैं इन दुःखों का निवारण कैसे करूं?
कोई देवों का आवाहन नहीं करते है, यज्ञ नहीं करते हैं, वेदों का अध्ययन नहीं होता है, ब्राह्मणों का सम्मान भी बंद हो गया है।
उसी तरह यज्ञ की क्रिया तथा सत्रयज्ञ भी नहीं चलतें है, दान और व्रत सभी बन्द हो गये है,
सज्जनों को दुःख प्राप्त होता है, धर्म के बंधन तोड़ दिये है, म्लेच्छों का धर्म वृद्धि को प्राप्त हो रहा है, गो हत्याएं हो रही है,
साधुओं का नाश हो रहा है, क्षत्रिय समाज नष्ट हो रहा है, इस प्रकार मुझे यवनों से अत्यधिक भय उत्पन्न हो गया है।
जैसे वेद पारंगत लोग मूर्ख के मुँह से वेद का मजाक उड़ाते हैं, वैसे ही सभी लोग मुझे म्लेच्छ के कब्जे में देखकर मेरा मजाक उड़ा रहे हैं।
जब जब मुझे राक्षसों से भय उत्पन्न हुआ, तब तब तुम शक्तिमान ने मेरी रक्षा की है।
इस प्रकार ब्रह्मदेव को बताकर, आंसुओं से युक्त विश्वभरा, गरम श्वास लेकर चुप हो गई।
जो विश्व के विश्वास के निवासस्थान है ऐसे ब्रह्मदेव ने उस विश्वभरा को व्याकुल एवं अस्थिर देखकर इस तरह आश्वासन दिया।
ब्रह्मदेव बोलें हे वसुंधरे! तू डर मत, तेरा शीघ्र ही कल्याण होगा अपने स्थान पर रहकर हे पृथ्वी! तू स्वस्थ एवं स्थिर रहो।
दया के सागर विष्णु की मैंने पहले परम भक्ति से प्रार्थना की थी, तब वे स्वयं मुझसे बोलें।
विष्णु बोले, हे ब्रह्मदेव तुम चिंता मत करो, मेरा कहना मानो, तुम्हारी अभीष्ट वस्तु शीघ्र ही पूर्ण होगी।
मालवर्मा का पुत्र जो कृतकार्य, शुभ लक्षणों वाला,
वायु के समान वेगवान, सूर्य के समान तेजस्वी, विश्व विजेता, पुण्यात्मा, पराक्रमी,
ऐसा शहाजीराजा दक्षिण का बड़ा प्रसिद्ध नृपश्रेष्ठ है, उनकी पत्नी महासाध्वी, यशस्विनी, यादवेन्द्र की पुत्री जीजाबाई पृथ्वी पर जागरूक हैं।
ऐसी वह तेजस्विनी रानी मुझे अपने गर्भ में धारण करेगी और उसका पुत्र बनकर मैं उसका प्रिय करूंगा।
मैं पृथ्वी पर शाश्वत धर्म मर्यादाओं को स्थापित करूंगा, यवनों का नाश करूंगा, देवों की रक्षा करूंगा,
यज्ञादि कर्म को पुनः स्थापित करूंगा, गायों एवं ब्राह्मणों का पालन करूंगा
ऐसा मुझे वचन देकर, हे कल्याणी! भूत, भविष्य को जानने वाले भगवान ने मुझे सत्यलोक जाने की अनुमति प्रदान की।
ऐसा बोलकर ब्रह्मदेव ने पृथ्वी का समाधान किया और उसको जाने के लिए बोला तो वह भी अपने घर चली गई।
त्रिभुवन के लिए अत्यंत कल्याणकारी एवं ह हृदय को आनंद देने वाली ब्रह्मदेव की वाणी को सुनकर म्लेच्छरूपी राक्षसों से उत्पन्न हुए भय को भुलाकर, वह अनुकूल समय की प्रतीक्षा करने वाली पृथ्वी, ब्रह्मर्षि, देव एवं ब्राह्मण के कुल के साथ आनंद को प्राप्त हुई।
अत्यंत पीड़ादायक हुए हजारों राक्षसों से व्याप्त संपूर्ण पृथ्वी को शीघ्र मुक्त करने की इच्छा करने वाले कृपालु एवं अनुपम विष्णु ने सुंदर मनुष्य रूप धारण करने की इच्छा प्रकट की।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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