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शिवभारतम् • अध्याय 5 • श्लोक 27
हितावहमसाधूनां साधूनामहितावहम्। दैत्यास्ततस्तमासाद्य पापीयासमनेहसम्।।
फिर दुष्टों के लिए हितकारी एवं सज्जनों के लिए अहितकर ऐसे उस पापमय कलिकाल को प्राप्त करके
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