त्रिभुवन के लिए अत्यंत कल्याणकारी एवं ह हृदय को आनंद देने वाली ब्रह्मदेव की वाणी को सुनकर म्लेच्छरूपी राक्षसों से उत्पन्न हुए भय को भुलाकर, वह अनुकूल समय की प्रतीक्षा करने वाली पृथ्वी, ब्रह्मर्षि, देव एवं ब्राह्मण के कुल के साथ आनंद को प्राप्त हुई।
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