मा भैषीर्भीरु भव्यं ते भविताशु वसुन्धरे।
स्वस्था स्वं स्थानमास्थाय स्थिरे स्थिरतरा भव।।
ब्रह्मदेव बोलें हे वसुंधरे! तू डर मत, तेरा शीघ्र ही कल्याण होगा अपने स्थान पर रहकर हे पृथ्वी! तू स्वस्थ एवं स्थिर रहो।
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