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शिवभारतम् • अध्याय 5 • श्लोक 36
त्वया विरचितं विच्चं विरिचे वन्चराचरम्। दनुजेम्लेंच्छतनुभिः तदद्य वत सीदति ।।
हे ब्रह्मदेव! आपके द्वारा विरचित जो ये चराचर जगत हैं, वह म्लेच्छरूपी राक्षासों के कारण हाय! आज डूब रहा है।
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