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अध्याय 4 — भवाटवी का वर्णन और रहूगण का संशयनाश
परमहंसगीता
26 श्लोक • केवल अनुवाद
जडभरत ने कहा - राजन्! यह जीवसमूह सुखरूप धमन में आसक्त देश-देशान्तर में घूम-फिरकर व्यापार करने वाले व्यापारियों के दल के समान है। इसे माया ने दुस्तर प्रवृत्तिमार्ग में लगा दिया है; इसलिये इसकी दृष्टि सात्त्विक, राजस, तामस भेद से नाना प्रकार के कर्मो पर ही जाती है। उन कर्मो में भटकता-भटकता यह संसाररूप जंगल में पहुँच जाता है। वहाँ इसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती।
महाराज! उस जंगल में छ: डाकू हैं। इस वणिक-समाज का नायक बड़ा दुष्ट है। उसके नेतृत्व में जब यह वहाँ पहुँचता है, तब ये लुटेरे बलात् इसका सब माल-मत्ता लूट लेते हैं तथा भेड़िये जिस प्रकार भेड़ों के झुंड में घुसकर उन्हें खींच ले जाते हैं, उसी प्रकार इसके साथ रहने वाले गीदड़ ही इसे असावधान देखकर इसके धन को इधर-उधर खींचने लगते हैं।
वह जंगल बहुत-सी लता, घास और झाड़-झंखाड़ के कारण बहुत दुर्गम हो रहा है। उसमें तीव्र डाँस और मच्छर इसे चैन नहीं लेने देते। वहाँ इसे कभी तो गन्धर्वनगर दीखने लगता है और कभी-कभी चमचमाता हुआ अति चंचल अगिया-बेताल आँखों के सामने आ जाता है।
यह वणिक्-समुदाय इस वन में निवासस्थान, जल और धनादि में आसक्त होकर इधर-उधर भटकता रहता है। कभी बवंडर से उठी हुई धूल के द्वारा जब सारी दिशाएँ धूमाच्छादित-सी हो जाती हैं और इसकी आँखों में भी धूल भर जाती है तो इसे दिशाओं का ज्ञान भी नहीं रहता।
कभी इसे दिखायी न देने वाले झींगुरों का कर्णकटु शब्द सुनायी देता है, कभी उलल्लुओं की बोली से इसका चित्त व्यथित हो जाता है। कभी इसे भूख सताने लगती है तो यह निन्दनीय वृक्षों का ही सहारा टटोलने लगता है और कभी प्यास से व्याकुल होकर मृगतृष्णा की ओर दौड़ लगाता है।
कभी जलहीन नदियों की ओर जाता है, कभी अन्न न मिलने पर आपस में एक-दूसरे से भोजनप्राप्ति की इच्छा करता है, कभी दावानल में घुसकर अग्नि से झुलस जाता है और कभी यक्षलोग इसके प्राण खींचने लगते हैं तो यह खिन्न होने लगता है।
कभी अपने से अधिक बलवान् लोग इसका धन छीन लेते हैं तो यह दुःखी होकर शोक और मोह से अचेत हो जाता है और कभी गन्धर्वनगर में पहुँचकर घड़ीभर के लिये सब दुःख भूलकर खुशी मनाने लगता है।
कभी पर्वतों पर चढ़ना चाहता है तो काँटे और कंकड़ों द्वारा पैर छलनी हो जाने से उदास हो जाता है। कुटुम्ब बहुत बढ़ जाता है और उदरपूर्ति का साधन नहीं होता तो भूख की ज्वाला से सन्तप्त होकर अपने ही बन्धु-बान्धवों पर खीझने लगता है।
कभी अजगर सर्प का ग्रास बनकर वन में फेंके हुए मुर्दे के समान पड़ा रहता है। उस समय इसे कोई सुध-बुध नहीं रहती। कभी दूसरे विषैले जन्तु इसे काटने लगते हैं तो उनके विष के प्रभाव से अन्धा होकर किसी अन्धे कुएँ में गिर पड़ता है और घोर दुःखमय अन्धकार में बेहोश पड़ा रहता है।
कभी मधु खोजने लगता है तो मक्खियाँ इसके नाक में दम कर देती हैं और इसका सारा अभिमान नष्ट हो जाता है। यदि किसी प्रकार अनेकों कठिनाइयों का सामना करके वह मिल भी गया तो बलातू दूसरे लोग उसे छीन लेते हैं।
कभी शीत, घाम, आँधी और वर्षा से अपनी रक्षा करने में असमर्थ हो जाता है। कभी आपस में थोड़ा-बहुत व्यापार करता है तो धन के लोभ से दूसरों को धोखा देकर उनसे बैर ठान लेता है।
कभी-कभी उस संसारवन में इसका धन नष्ट हो जाता है तो इसके पास शय्या, आसन, रहने के लिये स्थान और सैर-सपाटे के लिये सवारी आदि भी नहीं रहते। तब दूसरों से याचना करता है; माँगने पर भी दूसरे से जब उसे अभिलषित वस्तु नहीं मिलती, तब परायी वस्तुओं पर अनुचित दृष्टि रखने के कारण इसे बड़ा तिरस्कार सहना पड़ता है।
इस प्रकार व्यावहारिक सम्बन्ध के कारण एक-दूसरे से द्वेषभाव बढ़ जाने पर भी वह वणिक्-समूह आपस में विवाहादि सम्बन्ध स्थापित करता है और फिर इस मार्ग में तरह-तरह के कष्ट और धनक्षय आदि संकटों को भोगते-भोगते मृतकवत् हो जाता है।
हे वीरवर! साथियों में से जो-जो मरते जाते हैं, उन्हें जहाँ-का-तहाँ छोड़कर नवीन उत्पन्न हुओं को साथ लिये वह बनजारों का समूह बराबर आगे ही बढ़ता रहता है। उनमें से कोई भी प्राणी न तो आजतक वापस लौटा है और न किसी ने इस संकटपूर्ण मार्ग को पार करके परमानन्दमय योग की ही शरण ली है।
जिन्होंने बड़े-बड़े दिकक््पालों को जीत लिया है, वे धीर-वीर पुरुष भी पृथ्वी में 'यह मेरी है' ऐसा अभिमान करके आपस में वैर ठानकर संग्रामभूमि में जूझ जाते हैं तो भी उन्हें भगवान् विष्णु का वह अविनाशी पद नहीं मिलता, जो वैरहीन परमहंसों को प्राप्त होता है।
इस भवाटवी में भटकने वाला यह बनिजारों का दल कभी किसी लता की डालियों का आश्रय लेता है और उस पर रहने वाले मधुरभाषी पक्षियों के मोह में फँस जाता है। कभी सिंहों के समूह से भय मानकर बगुला, कंक और गिद्धों से प्रीति करता है।
जब उनसे धोखा उठाता है, तब हंसों की पंक्ति में प्रवेश करना चाहता है; किन्तु उसे उनका आचार नहीं सुहाता, इसलिये वानरों में मिलकर उनके जातिस्वभाव के अनुसार दाम्पत्य सुख में रत रहकर विषयभोगों से इन्द्रियों को तृप्त करता रहता है और एक-दूसरे का मुख देखते-देखते अपनी आयु की अवधि को भूल जाता है।
वहाँ वृक्षों में क्रीडा करता हुआ पुत्र और स्त्री के स्नेहपाश में बँध जाता है। इसमें मैथुन की वासना इतनी बढ़ जाती है कि तरह-तरह के दुर्व्यवहारों से दीन होने पर भी यह विवश होकर अपने बन्धन को तोड़ने का साहस नहीं कर सकता। कभी असावधानी से पर्वत की गुफा में गिरने लगता है तो उसमें रहने वाले हाथी से डरकर किसी लता के सहारे लटका रहता है।
शत्रुदमन! यदि किसी प्रकार इसे उस आपत्ति से छुटकारा मिल जाता है तो यह फिर अपने गोल में मिल जाता है। जो मनुष्य माया की प्रेरणा से एक बार इस मार्ग में पहुँच जाता है, उसे भटकते-भटकते अन्त तक अपने परम पुरुषार्थ का पता नहीं लगता।
रहूगण! तुम भी इसी मार्ग में भटक रहे हो, इसलिये अब प्रजा को दण्ड देने का कार्य छोड़कर समस्त प्राणियों के सुहृद् हो जाओ और विषयों में अनासक्त होकर भगवत्सेवा से तीक्ष्ण किया हुआ ज्ञानरूप खड़्ग लेकर इस मार्गको पार कर लो।
राजा रहूगण ने कहा - अहो! समस्त योनियों में यह मनुष्य-जन्म ही श्रेष्ठ है। अन्यान्य लोको में प्राप्त होने वाले देवादि उत्कृष्ट जन्मों से भी क्या लाभ है, जहाँ भगवान् हृषिकेश के पवित्र यश से शुद्ध अन्तःकरण वाले आप जैसे महात्माओं का अधिकाधिक समागम नहीं मिलता।
आपके चरणकमलों की रज का सेवन करने से जिनके सारे पापताप नष्ट हो गये हैं, उन महानुभावों को भगवान् की विशुद्ध भक्ति प्राप्त होना कोई विचित्र बात नहीं है। मेरा तो आपके दो घड़ी के सत्संग से ही सारा कुतर्क मूलक अज्ञान नष्ट हो गया है।
ब्रह्मज्ञानियों में जो वयोवृद्ध हों, उन्हें नमस्कार है; जो शिशु हों, उन्हें नमस्कार है; जो युवा हों, उन्हें नमस्कार है और जो क्रीडारत बालक हों, उन्हें भी नमस्कार है। जो ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण अवधूतवेष से पृथ्वी पर विचरते हैं, उनसे हम-जैसे ऐश्वर्योन्मत्त राजाओं का कल्याण हो।
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - उत्तरानन्दन! इस प्रकार उन परम प्रभावशाली ब्रह्मर्षिपुत्र ने अपना अपमान करने वाले सिन्धुनरेश रहूगण को भी अत्यन्त करुणावश आत्मतत्त्व का उपदेश दिया। तब राजा रहूगण ने दीनभाव से उनके चरणों की वन्दना की। फिर वे परिपूर्ण समुद्र के समान शान्तचित्त और उपरतेन्द्रिय होकर पृथ्वी पर विचरने लगे।
उनके सत्संग से परमात्मतत्त्व का ज्ञान पाकर सौवीरपति रहूगण ने भी अन्तःकरण में अविद्यावश आरोपित देहात्मबुद्धि को त्याग दिया। राजन्! जो लोग भगवदश्रित अनन्य भक्तों की शरण ले लेते हैं, उनका ऐसा ही प्रभाव होता है - उनके पास अविद्या ठहर नहीं सकती।
राजा परीक्षित ने कहा - महाभागवत मुनिश्रेष्ठ! आप परम विद्वान् हैं। आपने रूपकादि के द्वारा अप्रत्यक्षरूप से जीवों के जिस संसाररूप मार्ग का वर्णन किया है, उस विषय की कल्पना विवेकी पुरुषों की बुद्धि ने की है; वह अल्पबुद्धि वाले पुरुषों की समझ में सुगमता से नहीं आ सकता। अतः मेरी प्रार्थना है कि इस दुर्बोध विषय को रूपक का स्पष्टीकरण करने वाले शब्दों से खोलकर समझाइये।
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धर्म का अन्वेषण
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