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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 8
चलन् क्वचित्कण्टकशर्कराङ्घ्रि- र्नगारुरुक्षुर्विमना इवास्ते । पदे पदेऽभ्यन्तरवह्निनार्दितः कौटुम्बिकः क्रुध्यति वै जनाय ॥
कभी पर्वतों पर चढ़ना चाहता है तो काँटे और कंकड़ों द्वारा पैर छलनी हो जाने से उदास हो जाता है। कुटुम्ब बहुत बढ़ जाता है और उदरपूर्ति का साधन नहीं होता तो भूख की ज्वाला से सन्तप्त होकर अपने ही बन्धु-बान्धवों पर खीझने लगता है।
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