कभी पर्वतों पर चढ़ना चाहता है तो काँटे और कंकड़ों द्वारा पैर छलनी हो जाने से उदास हो जाता है। कुटुम्ब बहुत बढ़ जाता है और उदरपूर्ति का साधन नहीं होता तो भूख की ज्वाला से सन्तप्त होकर अपने ही बन्धु-बान्धवों पर खीझने लगता है।
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