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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 20
रहूगण त्वमपि ह्यध्वनोऽस्य सन्न्यस्तदण्डः कृतभूतमैत्रः । असज्जितात्मा हरिसेवया शितं ज्ञानासिमादाय तरातिपारम् ॥
रहूगण! तुम भी इसी मार्ग में भटक रहे हो, इसलिये अब प्रजा को दण्ड देने का कार्य छोड़कर समस्त प्राणियों के सुहृद्‌ हो जाओ और विषयों में अनासक्त होकर भगवत्सेवा से तीक्ष्ण किया हुआ ज्ञानरूप खड़्ग लेकर इस मार्गको पार कर लो।
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