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परमहंसगीता • अध्याय 4 • श्लोक 11
क्वचिच्च शीतातपवातवर्ष- प्रतिक्रियां कर्तुमनीश आस्ते । क्वचिन्मिथो विपणन् यच्च किञ्चि- द्विद्वेषमृच्छत्युत वित्तशाठ्यात् ॥
कभी शीत, घाम, आँधी और वर्षा से अपनी रक्षा करने में असमर्थ हो जाता है। कभी आपस में थोड़ा-बहुत व्यापार करता है तो धन के लोभ से दूसरों को धोखा देकर उनसे बैर ठान लेता है।
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